थोर्नडाइक का उद्दीपक-अनुक्रिया सिद्धांत | Thorndike Theory of Learning in hindi

थोर्नडाइक का उद्दीपक-अनुक्रिया सिद्धांत, थार्नडाइक का बिल्ली पर पहेली बॉक्स (Puzzle Box) में प्रयोग, विशेषताएं, कमियां, उपयोगिता,

अमेरिकी मनोवैज्ञानिक थार्नडाइक (Edward L. Thorndike) ने सीखने की प्रक्रिया के स्वरूप को समझने के लिए कुत्ते, बिल्ली एवं बंदर आदि जानवरों पर सीखने की प्रक्रिया संबंधी अनेक प्रयोग किए. थार्नडाइक ने सीखने के सिद्धांत का प्रतिपादन 1898 ईo में अपने पी-एचoडीo शोध प्रबंध जिसका शीर्षक 'एनिमल इंटेलिजेंस' था, में पशु व्यवहारों के अध्ययन के फलस्वरुप किया.

थार्नडाइक एक जाने-माने व्यवहारवादी थे. अतः उन्होंने सीखने की व्याख्या व्यवहारवादी सिद्धांतों के अनुकूल की है. उन्होंने इसकी व्याख्या करते हुए कहा है कि जब कोई उद्दीपन व्यक्ति के सामने दिया जाता है तो उसके प्रति वह कई अनुक्रिया करता है. इनमें सही अनुक्रिया का संबंध उस विशेष उद्दीपन के साथ हो जाता है. इस संबंध को सीखना कहा जाता है तथा इस विचारधारा को संबंधवाद (Connectionism) कहा गया.

थोर्नडाइक का कहना था कि पशु या मनुष्य किसी कार्य को 'प्रयत्न तथा भूल' की प्रक्रिया द्वारा सीखता है. उनके अनुसार प्रत्येक सीखने की परिस्थिति में शिक्षार्थी के सामने एक समस्या रखी जाती है. वह उस समस्या का समाधान करने के लिए अनेक प्रकार के अनुक्रिया करता है. इन अनुक्रियाओं में सही अनुक्रिया का शिक्षार्थी द्वारा चयन कर लिया जाता है और फिर बाद में यही सही अनुक्रिया उस समस्या के साथ संबंधित हो जाती है, जिसे हम सीखना कहते हैं. थार्नडाइक ने अपने सिद्धांत में सही अनुक्रिया को परिभाषित करते हुए कहा है कि "सही अनुक्रिया वह अनुक्रिया है, जिसके करने के बाद शिक्षार्थी को पुनर्बलन मिलता है." यही कारण है कि थार्नडाइक के सीखने के सिद्धांत को 'उद्दीपन-अनुक्रिया पुनर्बलन सिद्धांत' भी कहा जाता है.

थार्नडाइक का बिल्ली पर पहेली बॉक्स में प्रयोग (Thorndike's experiment on the cat in the Puzzle Box)

थार्नडाइक ने सीखने की प्रक्रिया के स्वरूप को समझने के लिए कुत्ते, बिल्ली एवं बंदर आदि जानवरों पर अनेक प्रयोग किए, परंतु इस संदर्भ में उनका एक बिल्ली पर किया गया प्रयोग बड़ा महत्वपूर्ण है. उन्होंने बिल्ली को बंद करने के लिए पिंजरा बनवाया. इस पिजड़े को पहेली पेटी (Puzzle Box) कहा जाता है. इस पिंजड़े में एक ऐसा खटका लगवाया जिसके दबने से पिजड़े का दरवाजा खुल जाता था.

थोर्नडाइक का उद्दीपक-अनुक्रिया सिद्धांत (Thorndike's Stimulus-Response Theory of Learning)

थार्नडाइक में एक दिन इस पिंजड़े में एक भूखी बिल्ली को बंद कर दिया. उसे पिंजरे में बंद करने के बाद पिंजड़े के बाहर एक प्लेट में मछली रख दी. मछली देखते ही भूखी बिल्ली ने पिंजरे से बाहर आने का प्रयत्न शुरू कर दिया. उसने बाहर आने के लिए कई प्रकार के प्रयत्न किए, कभी इधर-उधर कूदी और कभी इधर-उधर पंजे मारे. इस प्रयत्न में एक बार उसका पंजा अचानक उस खटके पर पड़ गया जिसके दबने से पिछड़े का दरवाजा खुलता था. प्ररिणामस्वरूप दरवाजा खुल गया और बिल्ली ने पिंजरे से बाहर निकलकर मछली खाई और अपनी भूख शांत की. थोर्नडाइक उस बिल्ली पर यह प्रयोग कई बार दोहराया और देखा कि बिल्ली ने धीरे-धीरे खटका दबाने की स्थिति तक पहुंचने में कम भूलें की और अंत में एक स्थिति ऐसी आई के बिना कोई भूल किये ही प्रयास में खटका दबाकर पिंजरे से बाहर आ गई. अर्थात, बिल्ली ने पिंजरा खोलना सीख लिया था.

थार्नडाइक ने इसे 'उद्दीपन-अनुक्रिया' सिद्धांत कहा है. इसे संक्षेप में 'S-R Theory' कहते हैं. इस सिद्धांत के अनुसार, सीखने के लिए पहली आवश्यकता होती है- 'उद्दीपक', दूसरी आवश्यकता 'अनुक्रिया' और तीसरी आवश्यकता 'उद्दीपन-अनुक्रिया में गहन संबंध'. इस सिद्धांत को 'अनुबंधन-सिद्धांत' भी कहते हैं. इसमें सीखने वाला प्रयत्न तथा भूल द्वारा सही अनुक्रिया तक पहुंचता है इसलिए इसे 'प्रयत्न तथा भूल का सिद्धांत' भी कहते हैं.

उद्दीपन अनुक्रिया सिद्धांत की विशेषताएं (Features of stimulus response theory)

  • यह सिद्धांत संबंधवाद (Connectionism) का समर्थक है, यह बात दूसरी है कि यह केवल उद्दीपन-अनुक्रिया में संबंध स्थापित होने को ही सीखना मानता है.
  • इस सिद्धांत के अनुसार सीखे हुए ज्ञान का प्रयोग कर पाना ही सीखना कहलाता है.
  • यह सिद्धांत सीखने के लिए उद्देश्य का होना आवश्यक मानता है.
  • यह सिद्धांत उद्देश्य प्राप्ति के लिए सीखने वाले के प्रयत्न को आवश्यक मानता है.
  • यह सिद्धांत सीखने के उद्देश्य के पीछे किसी प्रेरक अथवा अभिप्रेरक का होना आवश्यक मानता है.

उद्दीपन अनुक्रिया सिद्धांत की कमियां (Drawbacks of Stimulus Response Theory)

  • यह सिद्धांत पशुओं पर किये गये प्रयोग पर आधारित है, अर्थात यह मनुष्यों के सीखने की प्रक्रिया पर पूर्ण रुप से लागू नहीं होता है.
  • इस सिद्धांत के अनुसार सीखने के लिए उद्दीपक आवश्यक होता है, जबकि मनुष्य बिना उद्दीपक के भी अनुक्रिया करते हैं.
  • यह सिद्धांत प्रयत्न एवं भूल द्वारा सही अनुक्रिया तक पहुंचने की बात करता है, जबकि मनुष्य सूझ द्वारा सीधे भी सही अनुक्रिया कर सकते हैं.
  • यह सिद्धांत मनुष्य को एक जैविक मशीन और सीखने को एक यांत्रिक प्रक्रिया मानता है, जबकि मनुष्य के सीखने की प्रक्रिया में बुद्धि, चिंतन, तर्क और विवेक का बड़ा हाथ होता है.
  • यह सिद्धांत प्रयत्न तथा भूल द्वारा सीखने पर बल देता है, इसलिए इसमें समय अधिक लगता है.

उद्दीपन अनुक्रिया सिद्धांत की शिक्षा में उपयोगिता (Use of stimulus response theory in education)

  • बच्चों को कुछ भी सिखाने से पहले उन्हें सीखने के लिए तैयार करने में इस सिद्धांत का उपयोग किया जाता है.
  • इस सिद्धांत का प्रयोग मंदबुद्धि बालकों के लिए प्रयत्न एवं भूल द्वारा सीखने में किया जाता है.
  • इस सिद्धांत का उपयोग बच्चों द्वारा स्वयं के प्रयत्न से सीखने में किया जाता है.
  • इस सिद्धांत के प्रयोग से छात्रों द्वारा सही अनुक्रिया करने पर उनकी प्रशंसा करनी चाहिए और उनके असफल होने पर उन्हें बार-बार प्रयत्न करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए.
  • इस सिद्धांत के अनुसार सीखने के नियमों का सीखने की प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने में प्रयोग किया जाता है.

थोर्नडाइक के सीखने के नियम (Thorndike's Laws of Learning)

थोर्नडाइक ने सीखने के सिद्धांत में तीन महत्त्वपूर्ण नियम तथा 5 सहायक नियमों का वर्णन किया है. सीखने के महत्वपूर्ण नियम इस प्रकार हैं-

  • तत्परता का नियम
  • अभ्यास का नियम
  • प्रभाव का नियम

(i) तत्परता का नियम (Law of Readiness):- तत्परता का नियम यह बताता है कि सीखने वाले व्यक्ति किन किन परिस्थितियों में संतुष्ट रहते हैं तथा किन किन परिस्थितियों में उनमें खीज उत्पन्न होती है.

जब व्यक्ति किसी कार्य को करने के लिए तत्पर रहता है और उसे वह कार्य करने दिया जाता है तो उससे उसमें संतोष होता है. परन्तु जब व्यक्ति किसी कार्य को करने के लिए तत्पर रहता है और उसे वह कार्य नहीं करने दिया जाता तो उसमें उसे खीज उत्पन्न होती है. और जब व्यक्ति किसी कार्य को करने के लिए तत्पर नहीं रहता और उससे वह कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता है तो इससे भी उसमें खीज होती है.

शिक्षकों को पहले बालकों की अभिरुचि एवं अभिक्षमता का मापन कर लेना चाहिए ताकि उनकी तत्परता का उन्हें सही-सही ज्ञान हो.

(ii) अभ्यास का नियम (Law of Exercise):- अभ्यास का नियम इस तथ्य पर आधारित है कि अभ्यास से व्यक्ति में पूर्णता आती है अभ्यास का नियम यह बताता है अभ्यास करने से उद्दीपन तथा अनुक्रिया का संबंध मजबूत होता है तथा अभ्यास रोक देने से यह संबंध कमजोर पड़ जाता है.

थोर्न डाइक के अनुसार शिक्षक को चाहिए कि वे छात्रों को कक्षा में अधिक से अधिक बार विषय या पाठ को दोहराने दें, इसमें उन्हें कोई जल्दबाजी नहीं बरतनी चाहिए.

(iii) प्रभाव का नियम (Law of Effect):- इस नियम के अनुसार व्यक्ति किसी अनुक्रिया या कार्य को उसके प्रभाव के आधार पर सकता है. किसी कार्य या अनुपक्रिया का प्रभाव व्यक्ति में या तो संतोषजनक होता है या खीज उत्पन्न करने वाला होता है. प्रभाव संतोषजनक होने पर व्यक्ति उस अनुक्रिया को सीख लेता है तथा खीज उत्पन्न होने पर व्यक्ति us अनुक्रिया को दोहराना नहीं चाहता, परिणामस्वरू उसे वह भूल जाता है.

अतः शिक्षकों को कक्षा का वातावरण डरावना बनाकर नहीं रखना चाहिए बल्कि उन्हें कक्षा का वातावरण ऐसा बना कर रखना चाहिए कि उसमें छात्र अधिक से अधिक खुश हो तथा अध्यापन से संतुष्ट हो.

सीखने के सहायक नियम (Auxiliary Rules of Learning)

(i) बहूअनुक्रिया का नियम (Principle of multiple response):- यह नियम बताता है कि किसी भी सीखने की परिस्थिति में व्यक्ति अनेक अनुक्रियाएं करता है. इससे कुछ अनुक्रियांए, जो लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक नहीं होती है उन्हें व्यक्ति भूल जाता है तथा अनुक्रिया जो लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक होती है उसे वह सीख लेता है. इस नियम की शैक्षिक उपयोगिता यह बताई गई है कि छात्रों को कक्षा में किसी चीज को स्वयं करके सीखने के लिए प्रेरित करना चाहिए.

(ii) मानसिक वृत्ति या मनोवृत्ति का नियम (Principle of mental set pr attitude):- यह नियम बताता है कि शिक्षण की प्रक्रिया बहुत हद तक व्यक्ति के मानसिक वृत्ति तथा मनोवृत्ति पर निर्भर करती है मानसिक वृत्ति से तात्पर्य किसी कार्य को करने की तत्परता से होती है. मानसिक वृत्ति एवं मनोवृति से सिर्फ या नहीं पता चलता कि व्यक्ति क्या करेगा बल्कि यह भी पता चलता है कि किस चीज से संतुष्ट होगा और किस चीज से संतुष्ट नहीं होगा.

(iii) तत्व प्रबलता का नियम (Principle of prepotency of elements):- इस नियम के अनुसार किसी भी सीखने की प्रस्तुति में सुसंगत तथा असुसंगत दोनों ही तरह के तत्व होते हैं. जिनकी प्रबलता या सार्थकता अलग-अलग होती है. व्यक्ति सुसंगतक तत्वों को अलग कर लेता है, क्योंकि इनकी सार्थकता अपेक्षाकृत अधिक होती है.

(iv) अनुरूपता या सादृश्यता का नियम (Principle of analogy or similarity):- इस नियम के अनुसार व्यक्ति किसी नई परिस्थिति में वैसे ही अनुक्रिया को करता है जो उसके पूर्व अनुभव या पहले से सीखी गई अनुक्रिया के सदृश्य होता है. इस नई परिस्थिति में पहले सीखी गई परिस्थिति से कितना स्थानांतरण होगा, इस बात पर निर्भर करता है कि दोनों परिस्थितियों में सामान्य तत्त्व की संख्या कितनी है.

(v) साहचर्यात्मक स्थानांतरण का नियम (Principle of associative shifting):- इस नियम के अनुसार कोई भी अनुक्रिया जिसे करने की क्षमता व्यक्ति में है, एक नए उद्दीपन से भी उत्पन्न हो सकती है. यदि एक ही अनुक्रिया को लगातार एक ही परिस्थिति में कुछ परिवर्तनों के बीच उत्पन्न किया जाता है तो अंत में वही अनुक्रिया एक बिल्कुल ही नए उद्दीपन से भी उत्पन्न हो जाती है.

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