महाभारत की कथा | Mahabharat Story in hindi

भारतीय संस्कृति के महान ग्रंथों में 'महाभारत' एक ऐसा ग्रंथ है, जो सदियों से मात्र जनमानस को ही नहीं, विश्व-भर की विचारधारा को प्रभावित करता रहा है।

भूमिका

भारतीय संस्कृति के महान ग्रंथों में 'महाभारत' एक ऐसा ग्रंथ है, जो सदियों से मात्र जनमानस को ही नहीं, विश्व-भर की विचारधारा को प्रभावित करता रहा है। 'रामायण' और 'वेदों' की ही भांति 'महाभारत' भी धर्म की सटीक व्याख्या को अदभुत ढंग से प्रस्तुत करने में सफल ग्रंथ है।

'महाभारत' एक महान रचनाकार महर्षि वेदव्यास की महानतम रचना है। इसमें संपूर्ण मानव जीवन का सार तत्त्व निहित है। यह ग्रंथ संपूर्ण रूप से धर्म का आचरण करते हुए मानव जीवन को परमात्मा के सत्य-स्वरूप की ओर ले जाने वाला है। इस रचना को पढ़कर पाठक का मन द्रवित हो जाता है। कभी वह आनंद की निस्सीम तरंगों में बहता है तो कभी अवसाद की करुणा उसे झकझोर डालती है।

महाभारत' में एक स्थान पर लिखा है— 'हे भरत श्रेष्ठ (अर्जुन)! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संदर्भ में जो कुछ भी इस ग्रंथ में है, वही और ग्रंथों में भी मिल जाता है, परंतु जो इसमें है, वह कहीं नहीं है।'

इस ग्रंथ में, जिस विराट सनातन संस्कृति, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष विषयों का वर्णन किया गया है, उसे सर्वत्र इस ग्रंथ के कुछ पात्र, विशेषकर योगीराज कृष्णा, पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण, कौरव, पाण्डव, कुंती, द्रौपदी और गांधारी चरित्र वहन करते दिखलाई पड़ते हैं।

श्रीमद्भागवत गीता’ जैसी महान रचना इसी 'महाभारत' ग्रंथ का एक अंश है। जिसमें जीवन और जगत के साथ परमात्मा का तादात्म्य सहज रूप में दर्शाया गया है। यह अंश, मानव-जीवन की परमात्मा की ओर अग्रसर होने वाली संपूर्ण यात्रा का प्रशस्त पथ है। इस ग्रंथ में सर्वत्र श्री कृष्ण द्वारा प्रतिपादित धर्म के दर्शन होते हैं। जो कृष्ण कथन के अनुकूल नहीं है, वह अधर्म है और त्याज्य है, परंतु इस ग्रंथ में आने वाले छोटे-बड़े सभी पात्र, सहज मानवीय अनुभूतियों से भी जुड़े हुए हैं।

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महर्षि व्यास ने इस ग्रंथ में मानव जीवन का सर्वांग निचोड़ अपनी चिंतनधारा से अभिव्यक्त किया है। यह एक विशाल महाकाव्य है जिसे संस्कृत श्लोकों में रचा गया है। कहा जाता है कि स्वयं श्री गणेशजी ने इसे लिपिबद्ध किया था। “महर्षि व्यास महामुनि पराशर के कीर्तिमान पुत्र थे। उनका जन्म सत्यवती की कोख से हुआ था। महाभारत की कथा को लिपिबद्ध करने के लिए, उन्होंने श्री गणेशजी से प्रार्थना की थी। श्री गणेशजी ने उनकी प्रार्थना तो स्वीकार की, परंतु एक शर्त यह रख दी कि वे तभी लिखेंगे, जब वे लिखना प्रारंभ करें तो उनकी लेखनी रुकनी नहीं चाहिए। यदि लिखते-लिखते वे रुक गए तो वे भी लेखनी रख देंगे और फिर नहीं लिखेंगे।

गणेशजी की शर्त कठिन थी, परंतु व्यासजी ने उसे माना और इस महान ग्रंथ की रचना संभव हो सकी। महर्षि व्यास की इस रचना में जो काम और अर्थ की गहनता विद्यमान है, उसे ज्यों का त्यों प्रस्तुत करना तो संभव नहीं है, फिर भी यहां सरल भाषा में किशोर आयु के बच्चों को ध्यान में रखकर इसे संक्षिप्त रूप में लिखने का प्रयास किया गया है।

'महाभारत' ऐसा ग्रंथ है, जो हमें अधर्म के मार्ग पर बढ़ने से रोकता है और सत्य के मार्ग पर ले जाकर बताता है कि ईर्ष्या, क्रोध और विद्वेष से जीवन में कभी भी सफलता प्राप्त नहीं हो सकती। एक मामूली-सी बुरी आदत अथवा व्यसन भी धर्म पर आरूढ़ व्यक्ति को पराजित कर डालता है।

मुझे विश्वास है कि सरल भाषा में लिखी गई यह सचित्र 'महाभारत की कथा' हमारे पाठकों को अवश्य रुचिकर लगेगी और उनका मार्ग दर्शन करने में सहायक होगी।

विषय सूची

  1. महाराज शान्तनु
  2. देवव्रत (भीष्म)
  3. अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका
  4. धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर
  5. कुरु वंश के बालक
  6. गुरु द्रोणाचार्य
  7. रंगभूमि
  8. लाक्षागृह
  9. बकासुर-वध
  10. द्रोपदी-स्वयंवर
  11. राज्य विभाजन और इन्द्रप्रस्थ राज्य का निर्माण
  12. द्यूत-क्रीड़ा का आयोजन और द्रोपदी चीर-हरण
  13. पाण्डवों का बनवास
  14. भीम और हनुमान
  15. ईर्ष्यालु दुर्योधन
  16. पाण्डवों का अज्ञातवास और कीचकवध
  17. मंत्रणा और शांतिदूत श्रीकृष्ण
  18. कर्ण के प्रति कुंती की ममता
  19. दानवीर कर्ण
  20. गीता का उपदेश
  21. महाभारत युद्ध
  22. भीष्म मृत्यु-शय्या पर
  23. अभिमन्यु का वध
  24. जयद्रथ वध
  25. आचार्य द्रोण और घटोत्कच का अंत
  26. कर्ण और दुःशासन का अंत
  27. दुर्योधन का अंत और अश्वत्थामा का प्रतिकार
  28. अंतिम संस्कार
  29. पितामह भीष्म का देह त्याग
  30. राज्याभिषेक और श्रीकृष्ण की विदाई
  31. महाप्रस्थान

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