समय सारणी का अर्थ, आवश्यकता, सिद्धान्त, महत्त्व एवं उपयोगिता | Meaning, Need, Principle, Importance and Utility of Time Table in hindi

समय-सारणी अथवा समय प्रबन्धन के आधार पर ही विद्यालय में शैक्षिक एवं सह-शैक्षिक गतिविधियों का सुव्यवस्थित रूप से संचालन किया जाता है। इससे समय एवं श्रम

समय-सारणी का अर्थ (Meaning of Time Table)

प्रत्येक विद्यालय में विभिन्न विषयों का शिक्षण कार्य, खेलकूद, पाठ्य सहगामी क्रियाएँ, विभिन्न प्रायोगिक कार्य साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियाँ आदि अनेक क्रियाएँ चलती है। विद्यालय की सफलता एवं शैक्षिक उन्नति इन विभिन्न क्रियाओं के सुसंचालन पर निर्भर होती है। अतः विद्यालय के दैनिक कार्यों को योजनाबद्ध रूप में संचालित करने के लिए योजना बनाई जाती है, वही 'समय-सारणी' कहलाती है।

Meaning, Need, Principle, Importance and Utility of Time Table in hindi

समय-सारणी अथवा समय प्रबन्धन के आधार पर ही विद्यालय में शैक्षिक एवं सह-शैक्षिक गतिविधियों का सुव्यवस्थित रूप से संचालन किया जाता है। इससे समय एवं श्रम का सदुपयोग होता है तथा विद्यालय के समस्त कार्य व्यवस्थित एवं अबाध गति से चलते हैं। समय-सारणी समय प्रबन्धन के द्वारा हम यह जान लेते हैं कि विद्यालय में किस दिन किस समय, किस कक्षा के द्वारा तथा किसके नेतृत्व में कौन-सी क्रिया संचालित होती है। समय-सारणी के समन्वय एवं अर्थ को निम्नलिखित परिभाषाओं द्वारा स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है-

1. एच०जी० स्टीड के अनुसार, “विद्यालय की जिस योजना, तालिका या चार्ट के अनुसार प्रतिदिन के निर्धारित समय को विभिन्न विषयों, क्रियाओं एवं कक्षाओं के बीच प्रदर्शित किया जाता है या दर्शाया जाता है, समय-सारणी कहलाती है।

2. पिटमेन के शब्दों में, "सुव्यवस्थित समय-सारणी सुव्यवस्थित मस्तिष्क की उपज है।"

3. डॉ० जीवन नायक के अनुसार, "समय-सारणी विद्यालय का दूसरा घण्टा है जिसके मुख पर अवकाश अंकित है।"

4. डॉ० एस०एन० मुकर्जी के अनुसार, "समय-सारणी वह दर्पण है जिसमें विद्यालय का समस्त कार्यक्रम प्रतिबिम्बित होता है।"

5. टण्डन एवं त्रिपाठी के शब्दों में, "वह योजना अथवा तालिका जिसमें विद्यालय की दैनिक क्रियाओं, विषयों, कक्षाओं एवं समय का विभाजन दर्शाया जाता है, उसे समय-सारणी कहते हैं।

6. प्रो० बी०सी० रॉय ने समय-सारणी को “विद्युत का 'स्पार्क प्लग' कहा है जो विद्यालय को विविध क्रियाओं एवं कार्यक्रम को गति प्रदान करता है।"

डॉ० एस०एन० मुकर्जी के अनुसार, "विद्यालय प्रबन्ध एवं प्रशासन के अन्तर्गत प्रधानाचार्य का प्रमुख दायित्व दैनिक कार्यक्रम अथवा 'समय-सारणी' का निर्माण करना होता है। सन्तोषजनक समय-सारणी की रचना करना प्रधानाचार्य की योग्यता एवं कार्य कुशलता का परिचायक है। यह अध्यापकों को सुव्यवस्थित करता है और उनके सन्तुलन बनाए रखने में सहायक सिद्ध होता है।"

‘समय-सारणी' विद्यालय के दैनिक कार्यों की वह योजना है जिसके अनुसार विद्यालय की समस्त गतिविधियां संचालित होती हैं। इसके अनुसार विभिन्न कक्षाओं, विषयों और कालांशों में शिक्षण कार्य संचालित होता है एवं छात्र सह-शैक्षिक गतिविधियों में भाग लेते हैं। समय-सारणी को 'समय-तालिका', 'समय-विभाग चक्र' एवं 'समय-प्रबन्धन' के नाम से भी जाना जाता है।

इस प्रकार विद्यालय 'समय-सारणी' विषय अध्यापन एवं प्रवृत्तियों की विधियुक्त एवं पूर्व-व्यवस्थित योजना है जिसके अन्तर्गत विभिन्न विषयों, प्रवृत्तियों और कक्षाओं के मध्य दैनिक विद्यालय समय का विभाजन प्रदर्शित किया जाता है। यह वह घड़ी है जो विद्यालय परिवार को क्षण प्रतिक्षण सजग रखती है जिसके अनुसार विद्यालय व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित होती है।

समय-सारणी का महत्त्व एवं उपयोगिता (Importance and Utility of Time Table)

विद्यालय की अनेक प्रकार की दैनिक क्रियाओं को सुव्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिए एक श्रेष्ठ व सन्तुलित समय-सारणी बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। वस्तुतः समय-सारणी एक ऐसा दर्पण है जिसमे विद्यालय के समस्त शैक्षणिक कार्यक्रम प्रतिविम्बित होते हैं। समय-सारणी के महत्त्व एवं उपयोग को हम निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं-

1. विद्यालय कार्यक्रमों का ज्ञान:- विद्यालय में संचालित होने वाले समस्त कार्यक्रमों का सही ज्ञान प्राप्त करने के लिए समय-सारणी का अत्यधिक उपयोग एवं महत्त्व है। विद्यालय में संचालित पाठ्यक्रमों, पाठ्य सहगामी क्रियाओं, खेलकूद, कार्यरत शिक्षकों का तथा संचालित क्रियाओं के दिवस, समय, कालांश एवं अवधि का ज्ञान समय-सारणी द्वारा ही हो सकता है।

2. निरीक्षण की सुविधा:- समय-सारणी के द्वारा अधिकारी जान लेते हैं कि किस समय कौन-सा कार्य चल रहा है। इससे विभिन्न क्रियाओं का निरीक्षण करना सुविधाजनक रहता है।

3. कार्य-वितरण में समानता:– समय-सारणी से समस्त अध्यापकों के कार्यभार में समता लाई जा सकती है। समान कार्य वितरण सम्भव होता है। इससे उनमें मानसिक असन्तोष नहीं हो पाता है। समय-सारणी के द्वारा शिक्षकों को और भी अनेक लाभ हैं। इसके द्वारा उन्हें बीच-बीच में रिक्त कालांश देकर विश्राम का समय दिया जा सकता है जिससे उन्हें थकान न हो।

4. थकान एवं शिथिलता में कमी:- समय-सारणी किसी भी एक क्रिया को लम्बे समय तक नहीं होने देती। इससे एक ही कार्य को लम्बे समय तक करते रहने से ऊब तथा थकान से छुटकारा मिलता है। थोड़े समय पर क्रियाओं के बदले जाने से नीरसता समाप्त होती है। अच्छी सारणी में कठिन विषयों के बाद सरल विषयों के शिक्षण की व्यवस्था कर देने से भी थकान एवं शिथिलता कम होती है।

5. नैतिक गुणों का विकास:- समय-सारणी बालकों में अनेक नैतिक गुणों का विकास करती है। समय-सारणी से बालक व्यवस्थित कार्य करना सीखते हैं, वे समय के महत्त्व को जानने लगते हैं, उनमें नियमितता आती है, अनेक कार्यों की सुनियोजित व्यवस्था करना सीखते हैं तथा वे विभिन्न साधनों एवं समय के बीच समन्वय स्थापित करना जानते हैं।

6. समय एवं श्रम का सदुपयोग:- समय-सारणी के द्वारा विद्यालय के समस्त मानवीय एवं भौतिक साधनों का सुन्दर समन्वय किया जाता है। इस समन्वय के समस्त साधनों का अधिकतम उपयोग कम से कम व्यय पर सम्भव होता है। इससे समय तथा श्रम दोनों की बचत होती है।

7. कार्यकुशलता में वृद्धि:- समय-सारणी के द्वारा सभी कार्य नियमित समय पर कराये जाते हैं। प्रधानाध्यापक, अध्यापक तथा छात्र सभी जानते हैं कि उन्हें कब, क्या कार्य करना है। इससे कार्य में नियमितता आती है तथा सभी कार्यों को उचित महत्त्व प्रदान हो जाता है।

8. कार्यों में नियमितता:- समय-सारणी के द्वारा विद्यालय के समस्त कार्यों में नियमितता आती है, अस्त-व्यस्तता समाप्त होती है एवं अनुशासनहीनता खत्म होती है। समय-सारणी के द्वारा विभिन्न कार्यों में सामंजस्य स्थापित होता है। छात्र तथा अध्यापक दोनों को ही समय की उपलब्धता का ज्ञान रहता है। अतः वे अपने कार्यों को उसी हिसाब से करते हैं।

9. अनुशासन स्थापना सम्भव:- समय-सारणी के द्वारा बालकों तथा शिक्षक दोनों में ही अनुशासन स्थापित करने में सहायता मिलती है। समय-सारणी के द्वारा बालकों तथा शिक्षकों को विभिन्न क्रियाओं में हर समय व्यस्त रखा जा सकता है।

10. नियोजित शिक्षण सम्भव:– समय–सारणी से शिक्षक तथा छात्र यह जान लेते हैं कि प्रत्येक विषय के अध्ययन अध्यापन के लिए कितना समय दिया गया है। वे इसी हिसाब से शिक्षण को नियोजित करते हैं जिससे सम्पूर्ण पाठ्यक्रम पूरा किया जा सके।

11. विषय-विभाजन में उपयोगी:- समय-सारणी द्वारा छात्रों के स्तर, रूचि एवं उनके मानसिक व शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रम के समस्त विषयों का अध्ययन अध्यापन हेतु समुचित रूप से विभाजन किया जाता है। इस दृष्टि से समय–सारणी का अत्यधिक महत्त्व है।

अनुशासन में भी समय तालिका का बहुत महत्त्व होता है। प्रधानाध्यापक समय तालिका के माध्यम से छात्रों की शिक्षा के साथ-साथ मनोरंजन को भी अच्छी व्यवस्था कर सकता है तथा अनुशासन बनाये रखने के लिए खाली घण्टों में या कोई अध्यापक जो छुट्टी पर गया हो उसके स्थान पर अन्य अध्यापक को कक्षा दे सकता है।

समय-सारणी का निर्माण करने में ध्यातव्य प्रमुख सिद्धान्त (Principle of Time Table Formation)

विद्यालय में उपलब्ध सभी मानवीय एवं भौतिक साधनों का पूर्ण समन्वय करते, सभी को समान कार्यभार सौंपते हुए, विभागीय नियमों का पालन करते हुए तथा शैक्षिक उद्देश्यों की पूर्ति करने वाली वैज्ञानिक समय-सारणी का निर्माण करना काफी जटिल कार्य है। इसके निर्माण के समय निम्नलिखित कुछ प्रमुख सिद्धान्तों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए-

1. विभागीय नियमों का पालन:- समय-सारणी बनाते समय शिक्षा विभाग के विभिन्न नियमों का पालन करना चाहिए। किसी किसी राज्य ने समय-सारणी से सम्बन्धित बड़े व्यापक नियम दिए हैं। नियम हमें बढ़ाते हैं कि वर्ष में कितने दिन विद्यालय खुलेगा, किस विषय को कितना महत्त्व देना है तथा विद्यालय किस स्तर का है। प्राथमिक विद्यालय कम समय के लिए लगता है जबकि उच्च स्तर माध्यमिक अधिक समय के लिए समय-सारणी बनाते समय इन सभी को ध्यान में रखना चाहिए।

2. शिक्षकों के हितों का ध्यान:- समय सारणी के निर्माण में शिक्षकों की सुविधाओं का भी ध्यान रखना चाहिए। समय-सारणी में शिक्षकों की योग्यता, दक्षता एवं रूचि के अनुसार विषय दिए जाएं, उन्हें बीच-बीच में खाली कालांश दिए जाएँ, उन्हें समान कार्य भार दिया जाए तथा समय-सारणी निर्माण में अध्यापकों के साथ किसी भी बात का पक्षपात न किया जाए।

3. व्यापकता:- समय सारणी व्यापक होनी चाहिए। उसमें सभी विषयों के आवश्यक उप-विषयों तथा अन्य सहगामी क्रियाओं की पूर्ण एवं स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए। संक्षेप में समय-सारणी अपने में पूर्व होनी चाहिए।

4. विभिन्नता का सिद्धान्त:- समय-सारणी में विविधता तथा विभिन्नता लानी चाहिए। इसके तात्पर्य है कि प्रत्येक कालांश में विषयों की विविधता होनी चाहिए। दो समान प्रकृति के विषय लगातार से कालांशों में न पढ़ाये जाएँ। यह सिद्धान्त प्रयोगात्मक कालांश पर लागू नहीं होता है। एक ही विषय के प्रयोगात्मक शिक्षण के लिए दो लगातार कालांश हो सकते हैं।

5. साधनों की उपलब्धता:- समय-सारणी बनाते समय सभी उपलब्ध मानवीय एवं भौतिकांद साधनों का ध्यान रखना चाहिए। शिक्षक कक्ष, प्रयोगशाला भवन, उपकरण आदि सभी तथ्यों की उपलब्धत समय-सारणी को प्रभावित करती है, अतः समय-सारणी के निर्माण के समय इन सबका ध्यान रखन चाहिए।

6. थकान का ध्यान:- समय-सारणी के निर्माण में बालको तथा शिक्षकों की थकान का भी ध्यान रखना चाहिए। कुछ विषय अधिक थकान देते हैं जबकि कुछ विषय रोचक होते हैं। इसी प्रकार विद्यालय समय में कुछ समय बालक ताजा रहते हैं तथा उनकी ग्रहणशीलता अच्छी रहती है। समय-सारणी के निर्माण में इन सभी तथ्यों का बराबर ध्यान रखना चाहिए। समय-सारणी में थकान को दूर करने के लिए निम्नांकित उपाय करने चाहिए-

  • (i) प्रथम कालांश में छात्र मानसिक रूप से एकाग्र नहीं होते हैं पर उनमें थकान भी नहीं होती है, अत: कालांश में अपेक्षाकृत थोड़ी कम कठिनाई-स्तर वाले विषय समय सारणी मे रखने चाहिए।
  • (ii) दूसरे तथा तीसरे कालांश में थकान भी नहीं होती है तथा बालको में तत्परता भी आ जाती है। । अतः इन कालांशों में सबसे अधिक कठिन विषय रखने चाहिए। किन्तु इन विषयों को प्रकृति अलग-अलग होनी चाहिए, जैसे- अंकगणित तथा बीजगणित के कालांश साथ-साथ नहीं होने चाहिएँ।
  • (iii) तीसरे कालांश के पश्चात् अल्पावकाश रखा जाए। कठिन विषयों के अध्ययन से थकान हो जाती है। अत: थोड़ा मानसिक परिवर्तन करने के लिए अल्पावकाश रखना जरूरी है।
  • (iv) चौथे व पाँचवें कालांश में कुछ सरल विषयों का शिक्षण रखा जाना चाहिए। पाँचवे कालांश के पश्चात् मध्यान्तर होना चाहिए जिसमें छात्र मध्यान्ह भोजन कर सके।
  • (v) मध्याह्न के पश्चात् छात्रों में ताजगी तथा स्फूर्ति आती है। अत: छठवे कालांश में पुन: कठिन विषय पढ़ाया जा सकता है। सातवें कालांश मे कुछ सरल विषय रखना चाहिए। आठवें कालांश में सर्वाधिक थकान होती है तथा छात्र घर जाने के मूड में होते हैं, अत इस कालांश में सबसे सरल विषय का शिक्षण होना चाहिए।
  • (vi) अध्ययन हेतु तत्परता पर सप्ताह के दिनों का भी उल्लेखनीय प्रभाव पड़ता है। रविवार को छुट्टी के पश्चात् सोमवार को छात्र के दिमाग में छुट्टी का प्रभाव रहता है। अत: वह ठीक से नहीं पढ़ पाता। इस प्रकार शनिवार तक बालक थक जाता है और वह छुट्टी के मूड में होता है। ये दोनों दिन पढ़ाई के लिए अच्छे नहीं होते हैं। अतः कठिन विषयों की पढ़ाई के लिए मंगलवार, बुधवार तथा बृहस्पतिवार अधिक उत्तम होते हैं।
  • (vii) कालांश की लम्बाई का ध्यान रखा जाए। छोटी कक्षाओं में अपेक्षाकृत छोटे कालांश रखे जाएँ।
  • (viii) समय-सारणी के निर्माण के समय बालकों के शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक-आर्थिक पक्षों का ध्यान रखा जाए।

7. मौसम का ध्यान:– समय-सारणी निर्माण में मौसम सम्बन्धी तत्त्वों का भी ध्यान रखना पड़ता है। सामान्यतया यह स्वीकार किया जाता है कि ग्रीष्म ऋतु में कालांश छोटे होने चाहिए और शीत ऋतु में कालाश अपेक्षाकृत कुछ बड़े होने चाहिएं।

8. विषयों का काठिन्य:- प्रत्येक विषय का कठिनाई-स्तर अलग होता है, कुछ विषय छात्रों के दृष्टिकोण से अधिक कठिन होते हैं और कुछ विषय अपेक्षाकृत अधिक सरल होते है। समय-सारणी बनाते समय विषयगत कठिनाई स्तर का ध्यान रखना चाहिए। कठिन विषयों को समय-सारणी में अपेक्षाकृत अधिक समय दिया जाए तथा उनका शिक्षण उस समय रखा जाए जब वालक कम थकान का अनुभव करते हैं और पढ़ने के लिए अधिक तत्पर रहते हैं।

9. लचीलापन:– समय सारणी अधिक कठोर तथा स्थिर नहीं होनी चाहिए। बाद में उसमें कभी-कभी परिवर्तन करने की आवश्यकता पड़ जाती है। अतः समय-सारणी ऐसी बनाई जाए जिसमें आवश्यकता पड़ने पर सरलता से परिवर्तन किए जा सके और इन भावी परिवर्तनों का विद्यालय की सम्पूर्ण व्यवस्था पर कोई विशेष प्रभाव न पडे।

10. व्यक्तित्व का ध्यान:– समय-सारणी बनाते समय छात्रों के व्यक्तित्व के विकास का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए। उसमें छात्रों के नैतिक, शारीरिक, सामाजिक एवं चारित्रिक विकास के लिए आवश्यक सभी पाठ्य सहगामी क्रियाओं को समुचित स्थान देना चाहिए।

समय-सारणी के निर्माण की प्रमुख समस्याएँ (Major Problems of Time Table Formulation)

सामान्यतया विद्यालय के लिए समय-सारणी का निर्माण (संगठन) करने में प्रमुख रूप से निम्नलिखित समस्याएँ अथवा व्यावहारिक कठिनाइयाँ उपस्थित होती हैं-

1. शिक्षकों का अभाव:- समय-सारणी का निर्माण करने में सबसे प्रमुख समस्या विद्यालय में शिक्षकों का पर्याप्त मात्रा में न होना तथा विषयगत शिक्षकों का अभाव है, जिसके कारण न तो छात्र अपनी रुचि के अनुसार विषयों का चयन कर पाते हैं और न ही विद्यालय में उपलब्ध शिक्षक छात्रों की रुचि के अनुकूल विषयों को पढ़ा पाते हैं। अन्य विषयों के बोझ से शिक्षक तनावग्रस्त रहते हैं, जिससे उनकी कार्यक्षमता में गिरावट आती है।

2. वित्तीय अभाव:- वित्तीय अभाव के कारण विद्यालय में मानवीय एवं भौतिक संसाधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो पाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप एक प्रभावी एवं उपयोगी समय-सारणी का निर्माण नहीं हो पाता है।

3. शैक्षिक सामग्री का अभाव:- विद्यालय में पर्याप्त कक्षा-कक्ष, फर्नीचर, उपकरण एवं अन्य आवश्यक शैक्षणिक सामग्री का अभाव भी समय-सारणी के निर्माण में प्रमुख समस्या होती है।

4. अंशकालीन शिक्षक:- शिक्षकों की न्यूनता के कारण अनेक विद्यालयों में अंशकालीन शिक्षको की नियुक्ति करनी पड़ती है, किन्तु वे अपनी सुविधानुसार ही विद्यालय को समय दे पाते हैं। इससे समय-सारणी के निर्माण में अत्यधिक कठिनाई उत्पन्न होती है।

5. शिक्षकों का असहयोग:- कई बार कुछ शिक्षकों के असहयोगात्मक व्यवहार के कारण भी समय-सारणी के संगठन (निर्माण) में समस्या उत्पन्न हो जाती है। कुछ शिक्षक अपने स्वार्थ के कारण किन्हीं विषयों को पढ़ाना चाहते हैं तो कुछ कालांश के विषय में अपना विरोध प्रकट करते हैं।

वस्तुतः विद्यालय में उपलब्ध संसाधनों से एक निश्चित समय में सभी विषयों का शिक्षण सम्पन्न कराने के लिए तथा उसी समयावधि में अन्य गतिविधियों को पूर्ण करने के लिए उपयुक्त समय-सारणी का निर्माण करना अत्यन्त कठिन कार्य होता है।

समय-सारणी के पक्ष और विपक्ष में तर्क (Arguments in Pros and Cons of Time Table)

कुछ लोग तो समय-सारणी का समर्थन करते हैं तो कुछ इसके विरुद्ध हैं। जो लोग समय-सारणी के समर्थक है, उनका मत है कि समय-सारणी से स्कूल के कार्यों में एक निश्चित व्यवस्था बनी रहती है। परिणामस्वरूप स्कूल के विभिन्न क्षेत्रों में समान रूप से प्रगति होती है। जो लोग समय-सारणी के विरुद्ध हैं उनके तर्क निम्नलिखित हैं-

  1. स्वतन्त्रता का तर्क-आधुनिक शिक्षाशास्त्रियों के अनुसार विद्यार्थियों को शिक्षण प्रक्रिया में अधिक से अधिक स्वतन्त्रता दी जानी चाहिए। इसलिए कोई समय-सारणी नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह विद्यार्थियों की स्वतन्त्रता पर बाधक सिद्ध होती है।
  2. क्रिया केन्द्रित शिक्षा को महत्त्व-आज के युग में क्रिया केन्द्रित शिक्षा की आवश्यकता होती है, विषय केन्द्रित शिक्षा का नहीं। क्रिया केन्द्रित शिक्षा तभी सम्भव हो सकती है जब इस पर समय-सारणी का बन्धन न हो।
  3. शिक्षण की नवीन पद्धतियाँ-शिक्षा को आधुनिक प्रवृत्ति व्यक्तिगत विभिन्नताओं को स्वीकृति प्रदान करती है। इसलिए प्रोजैक्ट विधि तथा डाल्टन विधि को अधिक महत्त्व दिया जाता है क्योंकि इसमें विद्यार्थियों को खुला समय दिया जाता है।
  4. कालांश या पीरियड की अवधि-कालांश की अवधि इस बात पर निर्भर करती है कि अध्यापक और विद्यार्थी अपने काम में कितनी रुचि लेते हैं।

टाइम-टेबल के प्रकार (Types of Time Table)

टाइम-टेबल अनेक प्रकार का होता है, जिसमें से मुख्य चार प्रकार निम्नलिखित हैं-

1. सामान्य टाइम–टेबल:- इसमें स्कूल के प्रतिदिन के कार्यों का ब्यौरा होता है। इसमें पाठ्य-क्रियाओं के साथ-साथ पाठ्य सहायक क्रियाओं को भी दर्शाया जाता है।

2. कक्षा टाइम-टेबल:- प्रत्येक कक्षा तथा सैक्शन का अलग-अलग टाइम-टेबल होता है, जिसमे प्रत्येक पीरियड किस विषय का होगा? तथा कौन-सा अध्यापक इसको पढ़ायेगा इसका ब्यौरा होता है।

3. अध्यापकों के खाली पीरियड का टाइम-टेबल:- अध्यापकों के खाली पीरियड को दर्शाने के लिए यह टाइम-टेबल बनाया जाता है।

4. खेलों का टाइम-टेबल:- विद्यार्थियों की आयु तथा उनकी खेल निपुणता के आधार पर यह टाइम-टेबल बनाया जाता है।

समय तालिका की आवश्यकता (Need of Time Table)

समय तालिका विद्यालयी कार्यों के व्यवस्थित संचालन हेतु एक महत्त्वपूर्ण साधन है। समय तालिका के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए एस०एन० मुखर्जी लिखते हैं कि "समय तालिका महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि यह ऐसा दर्पण है जो समस्त शैक्षणिक कार्यक्रम को सत्यता के साथ प्रतिबिम्बित करता है।"

वास्तव में समय तालिका पूरे विद्यालय पर नियन्त्रण का कार्य करती है। समय तालिका का महत्त्व मानवीय साधनों का सदुपयोग एवं अनुशासन स्थापना के लिए बहुत अधिक है। समय-तालिका के विधिवत् प्रयोग से नियमितता को आदत तथा उत्तरदायित्व की भावना का विकास होता है। अच्छी समय तालिका से निम्नलिखित लाभ हैं-

  1. समय तालिका समय के सदुपयोग करने में सहायक होती है। यदि विद्यालयी कार्यक्रम बिना पूर्व नियोजन योजना के अनुसार चलाये जाएँगे तो अध्यापक और विद्यार्थी निरूद्देश्य भटकते रहेंगे। समय तालिका सोद्देश्य क्रियाएँ सम्पादित करने में सहायता प्रदान करती है।
  2. समय तालिका द्वारा विभिन्न विषयों को उनकी प्रकृति के अनुसार उपयुक्त समय की व्यवस्था की जाती है। सभी विषयों एवं क्रियाओं के लिए सुनिश्चित हो जाता है तथा किसी की अवहेलना नहीं होती।
  3. अच्छी समय तालिका शिक्षकों में कार्य के प्रति रुचि एवं प्रेरणा विकसित करके उन्हें कार्य कुशल बना देती है।
  4. अच्छी समय तालिका द्वारा विद्यार्थियों की व्यक्तिगत रुचियों, अभिरुचियों तथा योग्यताओं का में व्यस्त चरम उपयोग किया जाता है। अच्छी समय तालिका समस्त कक्षा को रुचिकर रूप रखने में सहायक होती है।
  5. समय तालिका के माध्यम से सभी विषयों को अध्यापकों एवं विद्यार्थियों द्वारा न्यायोचित समय प्रदान कराकर सन्तुलित महत्त्व प्रदान किया जाता है।
  6. समय तालिका मानव जीवन के महत्त्वपूर्ण मूल्यों एवं आदर्शों के प्रति आदर की भावना विकसित करने में सहायक सिद्ध होती है। समय तालिका का प्रयोग विद्यार्थियों में कर्त्तव्यपरायणता, समय-निष्ठता एवं उद्यम प्रियता के गुणों का विकास करती है।
  7. समय तालिका विद्यार्थियों में अनुशासनप्रियता विकसित करने में सहायक होती है। समय तालिका छात्रों की अनावश्यक क्रियाओं पर नियन्त्रण लगा देती है। समय तालिका में मध्यावकाश व खेलकूद का समय भी निर्धारित किया जाता है तथा पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाओ के अवसर उपलब्ध कराये जाते हैं, जिनमें विद्यार्थियों की ऊर्जा का सदुपयोग कराकर वृत्तियों का शोधन किया जाता है।
  8. समय तालिका द्वारा अध्यापक एवं विद्यार्थियों की क्रियाओं का समुचित निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण किया जाता है।

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