शैक्षिक मूल्यांकन का अर्थ, परिभाषा, उद्देश्य एवं सोपान | Meaning and Definitions of Educational Evaluation in hindi

शैक्षिक मूल्यांकन से तात्पर्य शिक्षा के क्षेत्र की विभिन्न वस्तुओं अथवा प्रक्रियाओं, जैसे- शिक्षण विधि, पाठ्यवस्तु, कक्षा शिक्षण, शिक्षा उद्देश्य,

शैक्षिक मूल्यांकन (Educational Evaluation)

शैक्षिक मूल्यांकन से तात्पर्य शिक्षा के क्षेत्र की विभिन्न वस्तुओं अथवा प्रक्रियाओं, जैसे- शिक्षण विधि, पाठ्यवस्तु, कक्षा शिक्षण, शिक्षा उद्देश्य, शैक्षिक कार्यक्रम, शिक्षा सामग्री इत्यादि की वांछनीयता को ज्ञात करने की प्रक्रिया से है। मूल्यांकन का प्रमुख उद्देश्य शैक्षिक निर्णय लेने में सहायता करना है। अतः शैक्षिक मूल्यांकनकर्ता का अन्तिम लक्ष्य शिक्षा में सुधार लाना है।

मापन के अन्तर्गत जहाँ किसी वस्तु को आंकिक रूप दिया जाता है वहीं मूल्यांकन प्रक्रिया में ठीक इसके विपरीत उस वस्तु का मूल्य निर्धारित किया जाता है। अर्थात् मूल्यांकन में इस सत्य का निर्धारण किया जाता है कि कौन-सी वस्तु अच्छी है और कौन-सी वस्तु खराब है। जब हम किसी व्यक्ति अथवा वस्तु या उसके गुण-दोषो के सन्दर्भ में अवलोकन करते है तो वहाँ मूल्यांकन निहित होता है। शिक्षा के क्षेत्र में मूल्यांकन को एक तकनीकी शब्द के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस तकनीकी प्रक्रिया के अन्तर्गत न केवल छात्रों की विषय विशेष सम्बन्धी योग्यता की ही जानकारी प्राप्त की जाती है बल्कि यह भी जानने का प्रयत्न किया जाता है कि उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास किस सीमा तक हुआ है। अतः स्पष्ट है कि मूल्यांकन प्रक्रिया एकाकी न होकर विभिन्न कार्यों की श्रृंखला है जिसके अन्तर्गत केवल एक ही कार्य निहित नहीं होता है बल्कि इसके अन्तर्गत कई सोपान सम्मिलित रहते हैं।

मूल्यांकन का अर्थ (Meaning of Evaluation)

मूल्यांकन का शाब्दिक अर्थ मूल्य का अंकन करना है। दूसरे शब्दों में मूल्यांकन मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया है। मूल्यांकन शिक्षण प्रक्रिया का एक अविच्छिन्न अंग है। यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। शिक्षक अपनी कक्षा के छात्रों का मूल्यांकन करते रहते हैं। मापन के अन्तर्गत किसी व्यक्ति या वस्तु के गुणों अथवा विशेषताओं का वर्णन किया जाता है जबकि मूल्यांकन के अन्तर्गत उस व्यक्ति अथवा वस्तु की विशेषताओं की वांछनीयता पर दृष्टिपात किया जाता है। मापन मूल्यांकन का एक अंग मात्र है। मापन वास्तव में स्थिति निर्धारण है जबकि मूल्यांकन उस स्थिति का मूल्य निर्धारण है। मूल्यांकन से शिक्षण प्रक्रिया को एक दिशा प्राप्त हो जाती है।

छात्रों की शैक्षिक उपलब्धि को अंकों में व्यक्त करना मापन का उदाहरण है जबकि छात्रों के प्राप्तांको के आधार पर उनकी उपलब्धि के स्तर के सम्बन्ध में सन्तोषजनक या असन्तोषजनक का निर्धारण करना मूल्यांकन का उदाहरण है। मूल्यांकन की प्रक्रिया छात्र की केवल शैक्षिक उपलब्धियों की केवल जाँच ही नहीं करती वरन् यह शिक्षक, शिक्षण-पद्धति, पाठ्यक्रम तथा शैक्षिक साधनों, सामग्रियों की उपयोगिता की भी जाँच करती है।

मूल्यांकन की परिभाषा (Definition of Evaluation)

मूल्यांकन की परिभाषाएं निमंलिखित हैं-

1. ब्रेडफील्ड एवं मोरडोक के अनुसार, "मूल्यांकन किसी घटना को प्रतीक आवष्टित करना है जिससे उस घटना का महत्त्व अथवा मूल्य किसी सामाजिक, सांस्कृतिक अथवा वैज्ञानिक मानदण्ड के सन्दर्भ में ज्ञात किया जा सके।"

2. एच० एच० रैमर्स तथा एम० एल० गेज के अनुसार, "मूल्यांकन में व्यक्ति अथवा समाज अथवा दोनों की दृष्टि से क्या अच्छा है अथवा क्या वांछनीय है का विस्तार निहित रहता है।"

3. एन० एम० डाण्डेकर के अनुसार, “मूल्यांकन को छात्रों के द्वारा शैक्षिक उद्देश्यों को प्राप्त करने की सोमा ज्ञात करने की क्रमबद्ध प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।"

4. जे० डब्ल्यू० राइटस्टोन के अनुसार, “मूल्यांकन एक नवीन प्राविधिक पद है, जिसका उपयोग मापन की धारणा को परम्परागत जाँचों एवं परीक्षाओं की अपेक्षा अधिक व्यापक रूप से व्यक्त करने के लिए किया गया है।"

5. कोठारी कमीशन (1966) के अनुसार, "मूल्यांकन एक क्रमिक प्रक्रिया है जो कि सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण अंग है और जो शैक्षिक उद्देश्यों से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित है।"

मूल्यांकन के उद्देश्य (Objectives of Evaluation)

1. छात्रों की वृद्धि एवं विकास में सहायता करना:- मूल्यांकन छात्रों की वृद्धि एवं विकास में सहायता करता है। छात्र मूल्यांकन के माध्यम से अपनी प्रगति के बारे में जान पाते हैं और अपने विकास का प्रयास करते हैं। छात्र को जिस क्षेत्र में अपने विकास में कमी लगती है वह उस क्षेत्र के विकास पर अधिक ध्यान केन्द्रित करता है। इस प्रकार उसका चतुर्मुखी विकास सम्भव हो पाता है।

2. छात्रों द्वारा अर्जित ज्ञान की जाँच करना:- मूल्यांकन द्वारा छात्र ने जिस ज्ञान को अर्जित किया है, वह कितना उपयोगी है तथा छात्र उसके माध्यम से अपना कितना विकास कर पाया है इस बात की जाँच मूल्यांकन के माध्यम से ही होना सम्भव है।

3. छात्रों की वृद्धि तथा विकास में उत्पन्न अवरोधों को जानना:– मूल्यांकन का एक उद्देश्य यह भी है कि छात्रों की वृद्धि तथा विकास के मार्ग में कौन-कौन से अवरोध उत्पन्न हो रहे हैं। उन परेशानियों को चिह्नित करना तथा उन्हें दूर करना। बालक का सर्वतोमुखी विकास तभी सम्भव है जब उसे अपनी बुद्धि एवं विकास के मार्ग की रुकावटों की जानकारी होगी और यह कार्य मूल्यांकन करता है।

4. छात्रों की शैक्षिक प्रगति में बाधक तत्त्वों को जानना:- मूल्यांकन के माध्यम से छात्रों की शैक्षिक प्रगति में आने वाले बाधक तत्त्वों का जान हो जाता है जिसके फलस्वरूप भविष्य में छात्र उन बाधक तत्त्वों को दूर करने का प्रयास करता है, निरन्तर अभ्यास करता है, अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास करता है। अतः मूल्यांकन का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य शैक्षिक प्रगति में बाधक तत्त्वों को जानना भी है। छात्रों को सोखने सम्बन्धी कठिनाइयों तथा कमजोरियों का ज्ञान होना आवश्यक है। मूल्यांकन की तकनीकी के प्रयोग से छात्रों की सोखने सम्बन्धी तत्त्वों को जानकर उन समस्याओं का निदान किया जाता है जो छात्र की शैक्षिक प्रगति में बाधक होते हैं।

5. छात्रों में प्रतियोगिता की भावना विकसित करना:— मूल्यांकन का एक उद्देश्य छात्रों में प्रतियोगिता की भावना विकसित करना भी है। छात्र प्रतियोगिता में सम्मिलित होने के लिए अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास करते हैं तथा अपना चतुर्मुखी विकास करना चाहते हैं। इस प्रकार मूल्यांकन छात्रों में प्रतियोगिता की भावना के द्वारा उनका विकास करने का प्रयास करता है।

6. छात्रों की व्यक्तिगत भिन्नताओं की जानकारी करना:- मूल्यांकन का एक उद्देश्य छात्रों की व्यक्तिगत भिन्नताओं को जानना भी है। कुशाग्र एवं मन्द बुद्धि छात्रों में भेद करने के लिए, अच्छी योग्यता एवं कम योग्यता के छात्रों में अन्तर करने के लिए हमें छात्रों की बुद्धि एवं योग्यता की विभिन्नताओं का मूल्यांकन करना आवश्यक होगा।

7. छात्रों का चयन एवं वर्गीकरण करना:- मूल्यांकन का एक उद्देश्य छात्रों का चयन एवं वर्गीकरण करना भी है। कक्षा शिक्षण करते समय छात्रों के बौद्धिक स्तर के आधार पर उनका चयन प्रतिभाशाली, सामान्य स्तर तथा मन्द बुद्धि के स्तर के छात्रों के रूप में जानना तथा उसी प्रकार वर्गीकरण के आधार पर छात्रों को शिक्षण देने के लिए मूल्यांकन की आवश्यकता पड़ती है।

8. कक्षोन्नति व रोजगार के लिए शैक्षिक योग्यता का प्रमाण:- पत्र देना-कक्षोन्नति एवं रोजगार प्राप्त करने के लिए प्रमाण पत्रों की आवश्यकता होती है। यह प्रमाण पत्र छात्रों को उनके मूल्यांकन के आधार पर ही वितरित किये जाते है जिसमें छात्रों को ग्रेड तथा नम्बर आदि लिखे होते हैं जो कि प्राप्त शैक्षिक योग्यता का प्रमाण होते हैं अतः इन सभी के लिए मूल्यांकन को आवश्यकता होती है।

9. शैक्षिक मानकों का निर्धारण करना:- मूल्यांकन के आधार पर ही शैक्षिक मानको का निर्धारण किया जाता है। जिस आधार पर छात्रों का स्तर तथा ग्रेड दिये जाते हैं उसी आधार पर प्रमाण-पत्र भी वितरित किये जाते है। बहुत अच्छा, अच्छा, सामान्य, मन्द बुद्धि के आधार पर ही मानक निश्चित किये जाते हैं। शैक्षिक निष्पत्ति में छात्र का स्तर क्या है यह इन मानकों के आधार पर ही पता चलता है।

10. छात्रों के शैक्षिक तथा व्यावसायिक निर्देशन के लिए आधार तैयार करना:— मूल्यांकन के द्वारा ही छात्रों के शैक्षिक तथा व्यावसायिक निर्देशन के लिए आधार तैयार किया जाता है। मूल्यांकन के परिणामों के आधार पर शैक्षिक एवं व्यावसायिक दिशा निर्देशन भी दिया जाता है। छात्र जिस क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन करता है उस क्षेत्र में उसकी सफलता की अधिक सम्भावना आँकी जाती है।

11. शिक्षण में सुधार लाना:- मूल्यांकन द्वारा यह विदित हो जाता है कि छात्र की शैक्षिक कमजोरियाँ क्यों या किन क्षेत्रों में है। भविष्य में शिक्षण करते समय शिक्षक शिक्षण में सुधार लाकर छात्रों की उन कमजोरियों को दूर करने का प्रयास करता है।

12. अध्यापकों की शिक्षण प्रभावशीलता को ज्ञात करना:- मूल्यांकन वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से शिक्षक अपने विषय का कितना जाता है, वह कितना प्रभावशीलता के साथ शिक्षण कार्य कर रहा है, इसका भी ज्ञान हो जाता है। अतः मूल्यांकन छात्रों के साथ-साथ शिक्षकों की शिक्षण प्रभावशीलता का मापन करने का भी एक साधन है।

मूल्यांकन प्रक्रिया के सोपान (Steps of Evaluation Process)

शिक्षा में मूल्यांकन का क्षेत्र बहुत व्यापक होता है। शिक्षा का ऐसा कोई क्षेत्र न होगा जिसका मूल्यांकन न होता हो चाहे शिक्षा का उद्देश्य हो, चाहे पाठ्यक्रम, चाहे शिक्षण की विधियाँ हो, चाहे छात्रों की शैक्षिक उपलब्धि किन्तु मूल्यांकन का सर्वाधिक प्रयोग छात्रों की उपलब्धियों का मूल्यांकन करने के लिए ही किया जाता है। यह मूल्याकन शिक्षा के किसी भी क्षेत्र में किया जाए और किसी भी उद्देश्य से किया जाए इसमें तीन बातों का ध्यान देना आवश्यक होता है यथा-

  1. शिक्षा का उद्देश्य
  2. सीखने की परिस्थितियाँ
  3. सीखने की परिस्थितियों का परिणाम।

मूल्यांकन की प्रक्रिया के अधोलिखित सात सोपान या पद निश्चित किए हैं-

1. शैक्षिक उद्देश्य का चयन (Choosing an Educational Objective)

शिक्षा एक उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है। मूल्यांकन प्रक्रिया का पहला पद यह ज्ञात करता है कि किसका मूल्यांकन करना है अर्थात् वे कौन-से शैक्षिक उद्देश्य हैं, जिनकी प्राप्ति की वांछनीयता को ज्ञात करना है। जब तक शैक्षिक उद्देश्यों का निर्धारण नहीं किया जायेगा तब तक उन उद्देश्यों की प्राप्ति के सम्बन्ध में कुछ भी कहना सम्भव नहीं हो सकेगा। शिक्षण के सामान्य उद्देश्य वास्तव में ऐसे व्यापक तथा अन्तिम लक्ष्य हैं जिनकी प्राप्ति किसी अध्यापक का एक सामान्य तथा दूरगामी लक्ष्य होता है। इनकी प्राप्ति के लिये एक लम्बा समय तथा सम्पूर्ण शिक्षा प्रक्रिया का योगदान आवश्यक होता है।

2. उद्देश्य का स्पष्टीकरण या परिमापीकरण (Explanation of Objective)

मूल्यांकन प्रक्रिया का द्वितीय सोपान है, उपयुक्त ढंग से चयन किए गए उद्देश्य का स्पष्टीकरण या उसकी व्याख्या करना। स्पष्टीकरण या व्याख्या का अभिप्राय चयन किए गए उद्देश्य को प्राप्ति से व्यवहार में होने वाले परिवर्तनों को स्पष्ट करना है। व्यवहार में होने वाले परिवर्तनों को सामान्यतः 4 शीर्षकों के अन्तर्गत स्पष्ट किया जाता है यथा-

  1. ज्ञान में वृद्धि
  2. कौशल की प्राप्ति
  3. रुचियों का विकास
  4. अभिवृत्तियों का निर्माण।

3. परिस्थितियों की पहचान (Identification of Circumstances)

मूल्यांकन के तृतीय सोपान के अन्तर्गत शिक्षक को उद्देश्य चयन के बाद ऐसी परिस्थितियों को पहचानना या चयन करना पड़ता है जिनमें छात्र अपेक्षित ज्ञान, कौशलों, रुचियों एवं अभिवृत्तियों की अभिव्यक्ति करने में विवश हो। इस प्रकार की परिस्थितियों में छात्र किस सीमा तक अपेक्षित परिवर्तन की अभिव्यक्ति करते है उससे हमें उनकी सीमा का पता लग सकता है।

4. मूल्यांकन प्रविधियों की जाँच एवं उनका चयन (Testing and Selection of Evaluation Methods)

शिक्षा में मूल्यांकन प्रक्रिया के चतुर्थ सोपान के अन्तर्गत यह देखने के लिए कि छात्रों के व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन किस सीमा तक हुए हैं। मूल्यांकन प्रविधियों की जाँच व चुनाव किया जाता है। यह चुनाव करते समय शिक्षक को यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रविधि इन उद्देश्यों की प्राप्ति की जाँच करने के लिए अधिकाधिक उपयुक्त प्रविधि हो। यदि इस कार्य को पूरा करने के लिए पूर्व निर्मित परीक्षाएँ उपलब्ध न हो सके तो शिक्षको को स्वयं उनका निर्माण करना चाहिए।

5. मूल्यांकन प्रविधियों का निर्माण (Creation of Evaluation Methods)

शिक्षा में मूल्यांकन प्रक्रिया के पंचम सोपान के अन्तर्गत यदि व्यावहारिक परिवर्तनों को जानने हेतु पूर्व निर्मित परीक्षण प्राप्त न हो या जो प्राप्त हुए हो वे अपूर्ण हो तो शिक्षकों को स्वयं उन प्रविधियों व विधियों की खोज करनी पड़ती है जिनसे इन परिवर्तनों को उचित रूप से देखा जा सके। मूल्यांकन की प्रविधियों का निर्माण करने में शिक्षकों को यह देखना पड़ता है कि (i) किस परिवर्तन को देखने के लिए कौन-सी प्रविधि उपयुक्ततम हो सकती है, (ii) क्या सोची हुई प्रविधि परिवर्तन के विषय में उपयुक्त प्रमाण एकत्रित कर सकती है, (iii) क्या इस पविधि के भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा प्रयोग किए जाने पर एक ही परिणाम प्राप्त होंगे तथा (iv) क्या इस प्रविधि का प्रयोग सुगमता से किया जा सकता है। यदि इन सब प्रश्नों के उत्तर सकारात्मक रूप में प्राप्त हो तो प्रविधि को उपयुक्त मान लेना चाहिए।

6. मूल्यांकन प्रविधि का प्रयोग एवं लेखन (Using and Writing the Evaluation Method)

शिक्षा में मूल्यांकन की प्रक्रिया के षष्टम् सोपान के अन्तर्गत मूल्यांकन प्रविधि के चयन व निर्माण के उपरान्त उसका प्रयोग किया जाता है। शिक्षकों को चाहिए कि इस प्रविधि के प्रयोग से जो कुछ भी व्यवहार में परिवर्तन देखने को मिले उन्हें लेखबद्ध कर लें। लिखित परीक्षाओं में तो छात्र लिखित उत्तरों के रूप में स्वयं अपना ब्योरा प्रस्तुत कर देते हैं। अतः शिक्षकों को व्यावहारिक परिवर्तनों के प्रमाण, प्राप्त करने में कोई कठिनाई नहीं होती। किन्तु ऐसी परिस्थितियों में जहाँ निरीक्षण, मौखिक परीक्षा, साक्षात्कार व प्रश्नावली ही ब्योरा प्राप्त करने का आधार होता है वहाँ छात्रों की प्रतिक्रियाओं का विस्तृत ब्यौरा स्वयं शिक्षकों को ही तैयार करना पड़ता है। कुछ अन्य परीक्षण परिस्थितियों में शिक्षक मत-सूची प्रयुक्त करते हैं, और उसमें दिए गए व्यावहारिक परिवर्तनों के विभिन्न प्रमाणों में से पड़ताल द्वारा कुछ विशिष्ट प्रकार के प्रमाणों का पता लगता है और उनको वे अंकित करते हैं।

7. लेखबद्ध प्रमाणों या साक्षियों की व्याख्या (Interpretation of Recorded Evidence or Witnesses)

शिक्षा में मूल्यांकन का सप्तम् या अन्तिम सोपान छात्रों के व्यावहारिक परिवर्तनों के सम्बन्ध में प्राप्त प्रमाणों के लेखबद्ध करने के बाद उनकी समुचित व्याख्या करना है। व्याख्या (i) निर्दिष्ट उद्देश्य, (ii) सीखने वाले को प्रारम्भिक स्थिति, (iii) सीखने वाले की अन्तिम स्थिति तथा (iv) सीखने के लिए प्रयुक्त की गई परिस्थितियों को ध्यान में रखकर की जाती है। यहाँ पर हमें एक बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए कि किस छात्र के परीक्षा में कितने अंक आए इतना बताने से मूल्यांकन का कार्य पूरा नहीं हो जाता है। उदाहरण के लिए यदि किसी छात्र के विज्ञान की परीक्षा में 60 अंक आए हैं तो इसका कोई अर्थ नहीं होता। यह तो मापन मात्र है न कि मूल्यांकन। यह अंक तो तभी महत्त्वपूर्ण व अर्थपूर्ण हो सकते हैं जबकि हम निम्नलिखित सूचनाएँ प्राप्त करके उनके आधार पर उनकी तुलना करें-

  1. परीक्षा में सबसे अधिक अंक कितने हैं?
  2. कक्षा में सबसे कम एवं सबसे अधिक अंक कितने हैं?
  3. कक्षा में औसत अंक क्या है?
  4. अमुक छात्र की सामर्थ्य एवं शक्तियाँ क्या हैं?
  5. क्या वे उसको योग्यता की उच्चतम प्राप्ति हैं?

उपर्युक्त बातों के अतिरिक्त भविष्य के परीक्षाफलों की एक पूर्व परीक्षाफल से तुलना उपयोगी सिद्ध होती है।

मूल्यांकन के प्रकार (Types of Evaluation)

मूल्यांकन को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

1. संरचनात्मक मूल्यांकन (Structural Evaluation)

जब कोई भी शैक्षिक योजना अपनी प्रारम्भिक या निर्माणावस्था में हो और उसका मूल्यांकन कर उसमें सुधार किया जा सके एवं उसकी प्रभावशीलता, गुणवत्ता, वांछनीयता या उपयोगिता को बढ़ाने के लिए किया जाता है तो इस प्रकार के मूल्यांकन को संरचनात्मक मूल्यांकन कहते हैं। इस विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी भी शैक्षिक योजना को अन्तिम रूप देने से पूर्व उसका मूल्यांकन कर उसमें सुधार करने की प्रक्रिया को ही संरचनात्मक मूल्यांकन कहकर पुकारते हैं। उदाहरणार्थ, यदि किसी शोध योजना के प्रथम प्रारूप का मूल्यांकन इस उद्देश्य से किया जा रहा है कि उसे प्रस्तुत करने और उस पर क्रियान्वयन करने से पूर्व उसमें वांछित सुधार कर उसे अधिक प्रभावशाली बनाया जाए तो इस प्रकार के मूल्यांकन को हम संरचनात्मक मूल्यांकन कहते हैं तथा मूल्यांकन की यह भूमिका संरचनात्मक भूमिका कहलाती है।

संरचनात्मक मूल्यांकन का उद्देश्य शैक्षिक कार्यक्रम तैयार करने वाले व्यक्ति को उसके द्वारा तैयार की गई योजना की कमियों को इंगित करना तथा उसमें सुधार के उपाय बताना होता है। इस दृष्टिकोण में संरचनात्मक मूल्यांकनकर्ता के कार्य को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम, शैक्षिक कार्यक्रम या योजना के गुण-दोषों के सम्बन्ध में स्पष्ट प्रमाण जुटाना द्वितीय, इन प्रमाणों के आधार पर कार्यक्रम की कमियों को सामने रखना; तृतीय, इन कमियों को दूर करके कार्यक्रम को अधिक प्रभावकारी रूप देने के लिए सुझाव प्रस्तुत करना।

2. योगात्मक मूल्यांकन (Summative Evaluation)

किसी शैक्षिक कार्यक्रम को अन्तिम रूप दे देने को एवं उसे चालू कर देने के पश्चात् उसकी समानता को ज्ञात करने के लिए किया गया मूल्यांकन योगात्मक मूल्यांकन कहलाता है। इस प्रकार के मूल्यांकन का उद्देश्य यह ज्ञात करना होता है कि उस योजना या कार्यक्रम को चालू रखा जाए या नहीं। स्पष्टता योगात्मक मूल्यांकन का अभिप्राय पहले से चल रही योजना को जारी रखा जाए या नहीं का निर्णय लेना होता है। इसके अतिरिक्त अनेक वैकल्पिक कार्यक्रमों में से किसको जारी रखा जाए और किसको छोड़ दिया जाए इस उद्देश्य की प्राप्ति योगात्मक मूल्यांकन द्वारा की जाती है।

उदाहरणार्थ, यदि एक अध्यापक को अपने छात्रों को किसी विषय के लिए कोई पुस्तक बतानी है और वह उस विषय पर उपलब्ध अनेक पुस्तकों में से मूल्यांकन कर कोई एक पुस्तक उन्हें बताता है तो शिक्षक का यह मूल्यांकन योगात्मक मूल्यांकन कहलाता है। इस विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि योगात्मक मूल्यांकन द्वारा अनेक विकल्पों में से सर्वोत्तम चयन करने की प्रक्रिया है परन्तु इस सर्वोत्तम का चयन विकल्पों के गुण-दोषों के मूल्यांकन के आधार पर किया जाता है।

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