सामाजिक गतिशीलता का अर्थ, परिभाषा एवं कारक | Meaning, Definition and Factors affecting of Social Mobility in hindi

सामाजिक गतिशीलता का अर्थ एवं परिभाषा, ऊपरी मुखी गतिशीलता और अधोमुखी गतिशीलता, समतल गतिशीलता और शीर्षात्मक गतिशीलता, गतिशीलता के घटक, शिक्षकों की भूमिक

▶सामाजिक गतिशीलता का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Social Mobility)

प्रत्येक समाज का अपना एक स्वरूप होता है और उसमें विभिन्न व्यक्तियों एवं समूह के विभिन्न सामाजिक स्तर होते हैं. समाज किसी भी प्रकार का क्यों ना हो परंतु उसके व्यक्तियों एवं समूहों के सामाजिक स्तरों में परिवर्तन होता रहता है. यह बात दूसरी है कि कुछ समाजों में इस परिवर्तन के लिए अधिक अवसर होते हैं और कुछ समाजों में कम. व्यक्ति अथवा समूह के सामाजिक स्तर में होने वाले परिवर्तन को ही समाजशास्त्रीय भाषा में सामाजिक गतिशीलता कहते हैं.

मिलर और वूक के शब्दों में- "व्यक्तियों अथवा समूह का एक सामाजिक ढांचे से दूसरे ढाँचे में संचालन होना ही सामाजिक गतिशीलता है."

शिक्षा और सामाजिक गतिशीलता (Education and Social Mobility)

▶ऊपरी मुखी गतिशीलता और अधोमुखी गतिशीलता (Upward Mobility and Downward Mobility)

जब हम व्यक्ति अथवा समूह के सामाजिक स्तर में परिवर्तन की बात करते हैं तो यह परिवर्तन किसी भी दिशा में हो सकता है. व्यक्ति अथवा समूह निम्न सामाजिक स्तर से उच्च सामाजिक स्तर पर भी पहुंच सकता है और उच्च सामाजिक स्तर से निम्न सामाजिक स्तर पर भी आ सकता है. किसी व्यक्ति या समूह के निम्न समाज के स्तर से उच्च सामाजिक स्तर पर पहुंचने की प्रक्रिया को ऊपरी मुखी सामाजिक गतिशीलता (Upward Social Mobility) कहते हैं और उसके उच्च सामाजिक स्तर से निम्न सामाजिक स्तर तक पहुंचने की प्रक्रिया को अधोमुखी सामाजिक गतिशीलता (Downward Social Mobility) कहते हैं.

▶समतल गतिशीलता और शीर्षात्मक गतिशीलता (Flat Mobility and Vertical Mobility)

हेरोल्ड एल हॉजकिंसन ने सामाजिक गतिशीलता के दो भेद किए हैं- एक समतल गतिशीलता (Horizontal Mobility) और दूसरी शीर्षात्मक गतिशीलता (Vertical Mobility). व्यक्ति अथवा समूह की केवल स्थान में परिवर्तन होने को उसमें समतल गतिशीलता की संज्ञा दी है. उदाहरणार्थ पिछड़े एवं छोटे जिले के जिलाधीश से उन्नत एवं बड़े जिले के जिलाधीश के तबादले से दोनों जिलाधिशों के सामाजिक स्तर में होने वाला परिवर्तन समतल गतिशीलता है. इसके विपरीत शीर्षात्मक गतिशीलता से उनका तात्पर्य किसी व्यक्ति अथवा समूह की एक पद से दूसरे पद पर पहुंचने से है. उदाहरणार्थ, एक सांसद का मंत्रिपरिषद में आना अथवा मंत्री का मंत्रीपरिषद  से हटकर केवल सांसद रह जाना शीर्षात्मक गतिशीलता है.

▶सामाजिक गतिशीलता के घटक (Factor Affecting Social Mobility)

(1). समाज का स्वरूप- यूं तो जितने समाज हैं उनके उतने ही प्रकार हैं परंतु मोटे तौर पर उन्हें दो वर्गों में बांटा जाता है- बंद समाज और खुले समाज. बंद समाज में वे समाज जाते हैं जो प्रायः जाति और धर्म पर आधारित होते हैं. और इनमें जो परंपराएं पड़ जाती हैं उनसे यह हटना नहीं चाहते इसलिए ने परंपरात्मक समाज भी कहा जाता है. इन समाजों में सामाजिक गतिशीलता बहुत कम होती है. जैसे गाँव में अछूत वर्ग के व्यक्ति ऊंचे ऊंचे पदों पर पहुंचने के बाद भी सवर्णों से बराबर का सम्मान प्राप्त नहीं कर पाते उनके सामाजिक स्तर में कोई अंतर नहीं होता. खुले समाज वह समाज होते हैं जो जाति धर्म परंपरा आदि के बंधनों से मुक्त होते हैं इनमें कोई व्यक्ति जन्म से उच्च अथवा निम्न नहीं माना जाता. इन समाजों में सामाजिक गतिशीलता बहुत अधिक होती है. जिस समाज में जाति धर्म व परंपराओं के बंधन जितने कम होते हैं, उनमें उतनी अधिक सामाजिक गतिशीलता पाई जाती है.

(2). समाज की आर्थिक व्यवस्था- अर्थोपार्जन के साधनों की दृष्टि से आर्थिक व्यवस्था के तीन भेद होते हैं- कृषिप्रधान, वाणिज्यप्रधान और उद्योगप्रधान. यह तथ्य सर्वविदित है कि कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था वाले समाज में सामाजिक गतिशीलता कम होती है. वाणिज्यप्रधान समाज में अपेक्षाकृत अधिक और उद्योग प्रधानसमाज में सर्वाधिक. आर्थिक संरचना की दृष्टि से भी आर्थिक व्यवस्था के तीन भेद होते हैं- पूंजीवादी, समाजवादी और मिश्रित. यह तथ्य भी सर्वविदित है कि सामाजिक गतिशीलता पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में सबसे कम, मिश्रित में सबसे अधिक और समाजवादी में सर्वाधिक होती है. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में पूँजी मुट्ठी भर हाथों में रहती है, शेष जनता का शोषण होता है, उसे अपने सामाजिक स्तर को उठाने की स्वतंत्र एवं समान अवसर प्राप्त नहीं होते. इसके विपरीत समाजवादी अर्थव्यवस्था में राष्ट्र की संपूर्ण संपत्ति पर राष्ट्र का अधिकार होता है, उसमें सभी व्यक्तियों को अपनी योग्यता एवं क्षमता अनुसार प्राप्त करने का अवसर प्राप्त होते हैं, प्रणामतः योग व्यक्ति आगे बढ़ते हैं और अयोग्य पीछे छूट जाते हैं. मिश्रित अर्थव्यवस्था इनके बीच की अर्थव्यवस्था है इसलिए उसमें सामाजिक गतिशीलता भी मध्यम गति की होती है.

(3.) महत्वाकांक्षा- कीसी समाज में उच्च पदों को प्राप्त करने तथा कुछ सामाजिक प्रतिष्ठा वाले व्यवसाय को करने के चाहे जितने अधिक अवसर प्राप्त हो परंतु यदि उसमें व्यक्ति एवं सामाजिक समूह में आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा नहीं है तो उसमें सामाजिक गतिशीलता नहीं के बराबर होगी इस प्रकार महत्वाकांक्षा सामाजिक गतिशीलता का एक मुख्य घटक होता है.

(4). शिक्षा- शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का सबसे मुख्य कारक है. जिन समाजों में शिक्षा की सुविधा है जितने अधिक मात्रा में सुलभ होती हैं उन समाजों में सामाजिक गतिशीलता उतनी ही अधिक होती है. यदि और बारीकी से देखा जाए तो सामाजिक गतिशीलता के अन्य सभी घटक भी शिक्षा पर ही निर्भर करते हैं. शिक्षा ही भिन्न-भिन्न व्यवसाय के लिए मार्ग प्रशस्त करती है.

(5). पदों एवं व्यवसाय की उपलब्धि- किस समाज में सामाजिक गतिशीलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि उस समाज में सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्र में उच्च पदों अथवा व्यवसाय को प्राप्त करने के कितने अवसर हैं. यदि किसी समाज में डॉक्टर, इंजीनियर, तकनीशियन और प्रशासकों आदि की अधिक मांग होती है तो समाज में लोगों को अपने सामाजिक स्तर में परिवर्तन करने के अधिक अवसर प्राप्त होते हैं. इसी प्रकार यदि समाज में व्यक्ति अथवा समूह को एक व्यवसाय से दूसरे व्यवसाय को करने के लिए अधिक अवसर प्राप्त होते हैं तो उसमें भी सामाजिक गतिशीलता अधिक होगी.

▶शिक्षा और सामाजिक गतिशीलता (Education and Social. Mobility)

शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का आधारभूत घटक एवं साधन है. कीसी समाज में सामाजिक गतिशीलता की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि उस समाज में सार्वभौमिक, अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा को किस स्तर तक सुलभ कराया गया है. उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में कितनी विविधता है, वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा की कैसी व्यवस्था है, व्यवसायिक शिक्षा पर कितना बल दिया गया है, शिक्षा समाज की मांगों की पूर्ति किस सीमा तक करती है और शिक्षा के अवसर किस सीमा तक सुलभ है, आदि.

(1). सार्वभौमिक, अनिवार्य एवं निशुल्क शिक्षा की सीमा- यह तथ्य सर्वविदित है कि जिस समाज में सार्वभौमिक, अनिवार्य एवं निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था जितनी दीर्घकालीन और प्रभावी होती है उस समाज में उतनी ही अधिक सामाजिक गतिशीलता होती है. शिक्षा से मनुष्य में जागरूकता आती है. वह समाज में अपने स्तर को उठाने के लिए प्रयत्नशील होता है और वह अपनी योग्यता और क्षमता के अनुसार आगे बढ़ता है.

(2). उच्च शिक्षा की व्यवस्था- सामाजिक गतिशीलता को बढ़ाने के लिए समाज में उच्च शिक्षा की व्यवस्था आवश्यक होती है. उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति को समाज में ऊंचे-ऊंचे पद प्राप्त होते हैं. जब तक निम्न सामाजिक स्तर के बच्चों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्राप्त नहीं होते तब तक वे उच्च पदों पर कैसे पहुंच सकते हैं!

(3). पाठ्यक्रम की विविधता- उचित शिक्षा का अर्थ है बच्चों को अपनी योग्यता एवं क्षमताओं के अनुसार विकास करने के अवसर प्रदान करना. इसके लिए सामान्य शिक्षा की समाप्ति पर शिक्षा के पाठ्यक्रम में विविधता होनी चाहिए. जिस समाज की शिक्षा में जितने अधिक प्रकार के पाठ्यक्रम होते हैं उस समाज में व्यक्ति को अपनी योग्यता और क्षमता के अनुसार विकास करने के उतने ही अधिक अवसर प्राप्त होते हैं और वह एक सामाजिक स्तर से दूसरे सामाजिक स्तर को प्राप्त करता है.

(4). वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा- उधोगप्रधान समाज में सामाजिक गतिशीलता सर्वाधिक होती है. उद्योग को स्थापित एवं विकसित करने के लिए जहां कच्चे माल की आवश्यकता होती है वहां पर शिक्षित कर्मकारों, इंजीनियरों तथा तकनीशियनों की आवश्यकता होती है दूसरी चीज की पूर्ति शिक्षा करती है. जिस समाज में विज्ञान और तकनीकी शिक्षा की जितनी अच्छी व्यवस्था होती है उस समाज में उतने ही अच्छे कर्मकार, इंजीनियर और टेक्नीशियन तैयार होते हैं और वे अपनी योग्यता अनुसार विकास करते हैं.

(5). शैक्षिक अवसरों की समानता- सामाजिक गतिशीलता को बढ़ाने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है शैक्षिक अवसरों की समानता. जब तक समाज में सभी बच्चों की जाति, धर्म, स्थान आदि किसी भी आधार पर भेद किए बिना उनकी  योग्यता अनुसार विकास करने का अवसर प्रदान नहीं किए जाते तब तक सामाजिक गतिशीलता को सर्वव्यापक नहीं बनाया जा सकता.

▶सामाजिक गतिशीलता के विकास में विद्यालय एवं शिक्षकों की भूमिका (Role of School and Teachers in the development of Social Mobility)

समाज में सामाजिक गतिशीलता को बढ़ाने के लिए आवश्यक है कि उसके विद्यालयों में सभी वर्गों के बच्चों को बिना किसी भेदभाव के प्रवेश दिया जाए. यह भी आवश्यक है कि बच्चों को उनकी अपनी योग्यता एवं क्षमता अनुसार पाठ्यक्रम के चुनाव की छूट दी जाए. इसके लिए आवश्यक है कि विद्यालयों में विभिन्न पाठ्यक्रमों की व्यवस्था हो और विज्ञान को स्कूली पाठ्यक्रम का एक अनिवार्य विषय बनाया जाए. जो बच्चे विज्ञान के क्षेत्र में आगे अध्ययन करने योग्य हैं उन्हें इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के समान अवसर प्रदान किए जाएं. विज्ञान और तकनीकी शिक्षा से सामाजिक गतिशीलता पर सीधा प्रभाव पड़ता है. स्कूलों से दो-चार किलोमीटर दूर रहने वाले बच्चों के लिए सवारी की व्यवस्था की जाए, अधिक दूर से आने वाले बच्चों के लिए छात्रावासों की व्यवस्था हो, निर्धन परंतु प्रतिभाशाली बच्चों को छात्रवृत्ति आदि दी जाए, पुस्तक सहायता एवं अन्य प्रकार के आर्थिक सहयोग देकर बच्चों को शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराए जाएं.

विद्यालय में बच्चों को अपनी योग्यता एवं क्षमता अनुसार शिक्षा प्राप्त करने के समान अवसर प्राप्त होंगे तो समाज में भी वे अपनी शैक्षिक योग्यता अनुसार पद प्राप्त कर सकेंगे और जैसे-जैसे उनकी शैक्षिक योग्यता बढ़ेगी तैसे-तैसे उनकी पदोन्नति होगी. दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि सामाजिक गतिशीलता बढ़ेगी. विद्यालयों एवं शिक्षाकों को अपने इस उत्तरदायित्व का निर्वाह करना चाहिए. इस क्षेत्र में सतत शिक्षा, दूर शिक्षा और खुली शिक्षा का बड़ा महत्व है. सरकार को इस प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए.

निष्कर्ष (Conclusion)

सोरोकिन ने अपने सामाजिक गतिशीलता के सिद्धान्त की विस्तृत विवेचना के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि यद्यपि लगभग सभी समाजों में गतिशीलता किसी न किसी रूप में अवश्य पाई जाती है, तथापि कुछ समाजों में उदग्र गतिशीलता के दोनों स्वरूपों का पूर्णतः अभाव पाया जाता है। ऐसे समाजों को सोरोकिन ने पूर्ण प्रतिबन्धित या बन्द समाज कहा है। इसके विपरीत, उदग्र गतिशीलता वाले समाज को मुक्त या गतिशील समाज कहा है। सोरोकिन का कहना है कि विश्व के प्रत्येक समाज में कम या अधिक मात्रा में उदग्र गतिशीलता निश्चित रूप से पाई जाती है। अत: यह कहना कि समाज स्थिर रहे हैं एक मिथ्या धारणा है। इनके अनुसार सदा संयत रहना गधे का गुण है।

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