जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत | Piaget Theory in hindi

जीन प्याजे ने बालक के संज्ञानात्मक विकास का गहराई से अध्ययन किया और मानव के मानसिक विकास की व्याख्या संज्ञानात्मक विकास के रूप में की है।

▶पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत (Piaget's Cognitive Development Theory)

जीन पियाजे एक स्विस मनोवैज्ञानिक थे। इनका जन्म 1886 ईसवी को स्विजरलैंड में हुआ था। आधुनिक युग में ज्ञानात्मक विकास के क्षेत्र मैं स्विजरलैंड के मनोवैज्ञानिक जिन पियाजे ने क्रांति पैदा कर दी। आज तक ज्ञानात्मक विकास के क्षेत्र में शोध एवं अध्ययन किए गए उनमे सबसे विस्तृत और वैज्ञानिक रूप से आदान जीन पियाजे जी ने किया।

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▶पियाजे के संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएं (Steps of Piaget’s cognitive development)

जीन प्याजे ने बालक के संज्ञानात्मक विकास का गहराई से अध्ययन किया और मानव के मानसिक विकास की व्याख्या संज्ञानात्मक विकास के रूप में की है। उसने संज्ञानात्मक विकास की चार महत्वपूर्ण अवस्थाएं बताई हैं -

(1). संवेदी गतिक अवस्था (Sensory Motor Stage)

पियाजे के अनुसार जन्म से 2 वर्ष तक की आयु के बालक अपनी इंद्रियों द्वारा प्राथमिक अनुभव प्राप्त करते हैं. पियाजे ने इस काल को संवेदी गतिक अवस्था कहा है. जन्म से 30 दिन तक की अवस्था में बालक केवल सहज क्रियाएं करता है. इन क्रियाओं में किसी भी वस्तु को मुंह से लेकर चूसने की क्रिया सबसे अधिक प्रबल होती है. 1 से 4 माह के बच्चों की सहज क्रियाएं कुछ सीमा तक उनकी अनुभूतियों द्वारा परिवर्तित होती हैं, दोहराई जाती हैं और एक दूसरे के साथ समन्वित (Co-ordinate) होती हैं. 4 माह से 6 माह की अवस्था में बच्चे वस्तुओं को स्पर्श करने और उन्हें इधर-उधर करने के अनुक्रिया करते हैं और साथ ही कुछ ऐसी अनुक्रिया करते हैं जिनसे उन्हें सुख मिलता है.

6 माह का होते होते बच्चे देखी गई वस्तु के अभाव में भी उसके होने को जानने लगते हैं. 8 माह से 12 माह तक की अवस्था में बच्चे उद्देश्य और उसको प्राप्त करने के साधन में अंतर करने लगते हैं और साथ ही अपने से बड़ों की क्रियाओं का अनुकरण करने लगते हैं. इस अवस्था में बच्चे जो स्कीमा (Schema) अर्थात व्यवहारों के संगठित पैटर्न सीखते हैं, उनका समानयीकरण भी करने लगते हैं. 12 से 18 माह की अवस्था में बच्चे वस्तुओं के गुणों को प्रयत्न एवं भूल द्वारा सीखकर ग्रहण करते हैं. 18 माह से 24 माह की अवस्था में बच्चे देखी गई वस्तु की अनुपस्थिति में भी उसके अस्तित्व को समझने लगते हैं.

(2). पूर्वसंक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational Stage)

पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास की दृष्टि से 2 साल से 7 साल की आयु अवस्था को पूर्व संक्रियात्मक अवस्था कहा है. इस अवस्था मे 2 वर्ष की आयु से 4 वर्ष की आयु तक के बच्चे अपने इर्द-गिर्द की वस्तुओं और प्राणियों में तथा वस्तुओं और शब्दों में संबंध स्थापित करने लगते हैं. वे यह सब प्रायः अनुकरण एवं खेल द्वारा सीखते हैं. पियाजे के अनुसार 4 वर्ष तक की अवस्था के बच्चे सभी निर्जीव वस्तुओं को सजीव प्राणियों के रूप में समझते हैं.

इसे उन्होंने जीववाद (Animism) की संज्ञा दी है. इस अवस्था में होने वाली संज्ञानात्मक विकास की दूसरी विशेषता यह होती है कि बच्चे अपने विचार को सही मानते हैं और वे कुछ ऐसा समझते हैं कि सारी दुनिया उनके इर्द-गिर्द ही है. इसे पियाजे ने आत्मकेंद्रिता (Egocentrism) की संज्ञा दी है. 4 वर्ष की आयु से 7 वर्ष की आयु तक के अवस्था में बालक भाषा सीखने लगते हैं और चिंतन एवं तर्क करने लगते हैं, परंतु उनके चिंतन एवं तर्क में कोई क्रमबद्धत्ता नहीं होती. 6 वर्ष की आयु पूरी करते-करते बालकों में मूर्त संप्रत्ययों के साथ-साथ अमूर्त संप्रत्ययों का निर्माण भी होने लगता है.

(3). मूर्त संक्रिया की अवस्था (Stage of Concrete Operation)

पियाजे ने 7 वर्ष से लेकर 11 वर्ष तक की आयु अवस्था को मूर्त संक्रिया अवस्था कहा है. इस अवस्था के बच्चे अधिक व्यावहारिक एवं यथार्थवादी होते हैं. इस अवस्था में बच्चों में तर्क एवं समस्या-समाधान की क्षमता का विकास होने लगता है, परंतु वह मूर्त समस्याओं के समाधान तो ढूंढने लगते हैं लेकिन अमूर्त समस्याओं के विषय में नहीं सोच पाते. इस अवस्था के बच्चे वस्तु को उनके गुणों के आधार पर क्रमबद्ध और वर्गीकृत करने लगते हैं, परंतु इस अवस्था के बच्चों के चिंतन में क्रमबद्धता नहीं होती.

(4). औपचारिक संक्रिया की अवस्था (Stage of Formal Operations)

यह अवस्था 12 वर्ष की आयु से व्यस्क होने तक की अवस्था है. 12 वर्ष के होते होते बच्चों का मस्तिष्क परिपक्व होने लगता है. उनके चिंतन में क्रमबद्धता आनी शुरू हो जाती है और जैसे-जैसे उनकी आयु और अनुभव बढ़ते जाते हैं वैसे-वैसे उनकी समस्या समाधान की क्षमता भी बढ़ती जाती है. इसे प्याजे ने औपचारिक संप्रत्यात्मक चिंतन की संज्ञा दी है. पियाजे के अनुसार इस आयु के बच्चे प्रतीकात्मक शब्दों, रूपकों एवं उपमानों का आशय भी समझने लगते हैं और अमूर्त प्रत्यय के निर्माण में ऊंची ऊंची उड़ान भरने लगते हैं. पियाजे के अनुसार संप्रत्यय निर्माण की यह क्रिया मनुष्य के जीवन में अनवरत रूप से चलती है, परंतु इसका आकार एवं स्तर उनकी शिक्षा एवं अनुभव पर निर्भर करता है.

▶पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत में महत्वपूर्ण संप्रत्यय (Important Concepts in Piaget's theory of Cognitive Development)

पियाजे अपने संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत में कहते हैं कि बालक भारत में वास्तविकता के स्वरूप के बारे में चिंतन करने तथा उसे खोज करने की शक्ति ना तो बालक के परिपक्वता स्तर पर और न ही सिर्फ उसके अनुभवों पर निर्भर करती है। बल्कि इन दोनों की अंतः क्रिया द्वारा निर्धारित होती है। पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत में महत्वपूर्ण संप्रत्यय इस प्रकार हैं-

अनुकूलन:– पियाजे के अनुसार बालकों में वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करने की जन्मजात प्रवृत्ति को आंदोलन कहते हैं। ये अनुकूलन की उपक्रियाये हैं।

आत्म सात्करण:– आत्मसात करण से अभिप्राय है कि वह बालक अपनी समस्या का समाधान करने के लिए हथवा वातावरण के साथ सामान्य स्थापित करने हेतु पूर्व में सीटी गए क्रियाओं का सहारा लेता है।

समायोजन:– समायोजन के अंतर्गत पूर्व में सीखी गई क्रियाएं काम में नहीं आती।बल्कि इसमें बालक अपनी योजना और व्यवहार में परिवर्तन लाकर वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश करता है।

साम्य धारण:– इस प्रकार का प्रत्यय अनुकूलन से मिलता जुलता हैं। साम्य धारण में बालक आत्मसात करण व समायोजन के बीच संतुलन स्थापित करता है।साम्य धारण प्रत्यय में बालक आत्म सात्करण वह समायोजन दोनों का प्रयोग करता है।

संरक्षण:– संरक्षण से अभिप्राय वातावरण में परिवर्तन तथा स्थिरता को पहचानने व समझने की क्षमता से है।किसी वस्तु के रूप रंग में परिवर्तन को उस वस्तु के तत्व में परिवर्तन से अलग करने की क्षमता से।

संज्ञानात्मक संरचना:– किसी भी बालक का मानसिक संगठन या मानसिक क्षमताओं के सेट को संज्ञानात्मक संरचना कहते हैं।

मानसिक संक्रिया:- बालक द्वारा किसी समस्या के समाधान पर चिंतन करना मानसिक संक्रिया करना जाता है।

स्कीम्स:– व्यवहारों में संगठित पैटर्न में को जिसे आसानी से दोहराया जा सके।जैसे कार चलाने की के लिए कार्य स्टार्ट करना गियर लगाना स्पीड देना आदि।

स्कीमा:– स्कीमा से तात्पर्य से मानसिक संरचना से है जिसका सामान्यकरण किया जा सके।

विकेंद्रीकरण:– किसी भी वस्तु या चीज के बारे में वस्तुनिष्ट या वास्तविक ढंग से सोचने की क्षमता विकेंद्रीकरण कहलाती है। प्रारंभ में बालक ऐसा नहीं सोचता परंतु 2 साल का होते होते हो वस्तु के बारे में वास्तविक ढंग से सोचने लगता है।

▶पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त के शैक्षिक उपयोग (Educational Application of Piaget's Cognitive Development Theory)

पियाजे का संज्ञानात्मक सिद्धान्त के शैक्षिक उपयोग निम्न हैं-

  1. पियाजे के संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत में कहा गया है कि अध्यापक अपने आप को विद्यार्थी के स्थान पर रखे। और उनकी समस्याओं को विद्यार्थियों की दृष्टि से देखे।इसे साक्षत्कार, प्रश्नावली, निरीक्षण विधि द्वारा किया जा सकता हैं।
  2. अध्यापक को यह चाहिए कि वो छात्र को स्वयं सीखने दे।उन्हें अपने अधिगम को स्वयं संचालित करना चाहिए।
  3. बालक अपने ज्ञान का निर्माण स्वयं कर सकते है। उनके सीखने समझने के निर्माण का अलग ढंग होता हैं। अतः उन्हें सुविधाएं देकर स्वयं सीखने का अवसर देना चाहिए।
  4. छात्र को जितना अधिक करके सीखने का अवसर मिलेगा। उसका ज्ञान उतना ही अधिक स्थायी और स्पष्ठ होगा।
  5. पियाजे के अनुसार संज्ञानात्मक या मानसिक विकास निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
  6. बालकों का मानसिक विकास धीरे-धीरे एक सोपान के तहत होता रहता है।अध्यापकों को पहले बालकों के मानसिक विकास की अवस्था का निर्धारण कर तब उसे शिक्षित करने हेतु योजना बनानी चाहिए।
  7. तार्किक चिंतन के विकास में बाल्यावस्था महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती हैं।अतः शिक्षकों को बच्चों में तार्किक क्षमता बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए।
  8. वर्ग में सामान्य रूस के विद्यार्थियों को छोटे-छोटे समूहों में विभाजित कर उनमें विचार के माध्यम से तार्किक बुद्धि के विकास के अवसर देने चाहिए।
  9. बच्चों को गलती करने और उसमे स्वयं सुधारने का पर्याप्त अवसर देना चाहिए।
  10. शिक्षकों को प्रयोगात्मक शिक्षा एवं व्यावहारिक शिक्षा पर बल देना चाहिए प्रयोगों के माध्यम से बालकों में नवीन विचार का संचार होता है।नवीन दृष्टिकोण मौलिक अन्वेषण के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण होता है।

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