पितृसत्ता का अर्थ, विशेषताएं एवं दोष | Patriarchy in hindi

सामान्य रूप से "पितृसत्ता" को पुरुषों द्वारा स्त्रियों के ऊपर प्रभुत्व की प्रणाली के रूप में समझा जा सकता है. पितृसत्ता के जरिए संस्थाओं के खास समूह

पितृसत्ता (Patriarchy)

पितृसत्ता एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जिसमें महिला की तुलना में पुरुष की अधिक केंद्रीय भूमिका होती है. भौतिक परिस्थितियों और सामाजिक संरचनाओं के कारण पुरुषों को अधिक अधिकार प्राप्त होते हैं और निर्णय लेने का अधिकार पुरुषों को अधिक मिला होता है. इस व्यवस्था में महिलाओं की स्थिति मुख्य ना हो कर गौण होती है. निर्णय प्रक्रिया में उनका अधिक महत्व नहीं होता है. महिलाएं पुरुषों पर लगभग आश्रित रहती हैं. घर की वस्तुएं, जमीन, जायदाद आदि पुरुष के नाम पर ही होता है यहां तक कि बच्चों की पहचान भी पिता के नाम से ही होती है. विवाह के बाद महिलाओं का उपनाम (Surname) भी बदल दिया जाता है.

पितृसत्ता

सामान्य रूप से "पितृसत्ता" को पुरुषों द्वारा स्त्रियों के ऊपर प्रभुत्व की प्रणाली के रूप में समझा जा सकता है. पितृसत्ता के जरिए संस्थाओं के खास समूह को पहचाना जाता है. इसको निम्रतः परिभाषित करने की कोशिश की गई है.

सिल्विया वेबली के अनुसार, "पितृसत्ता को सामाजिक संरचना और क्रियाओं की एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें पुरुषों का स्त्रियों पर वर्चस्व रहता है, और वे उनका शोषण व उत्पीड़न करते हैं."

गर्डा लर्नर ने पितृसत्ता को इस प्रकार प्रभाषित किया है- "पितृसत्ता परिवार में स्त्रियों और बच्चों पर पुरुषों के वर्चस्व की अभिव्यक्ति और संस्थागतकरण तथा सामान्य रूप से स्त्रियों पर पुरुषों के सामाजिक वर्चस्व का विस्तार है. इसका अभिप्राय है कि पुरुषों का समाज के सभी महत्वपूर्ण सत्ता प्रतिष्ठानों पर नियंत्रण रहता है और स्त्रियां ऐसी सत्ता तक पहुंचने से वंचित रहती हैं."

वह यह भी कहती हैं कि इसका मतलब यह नहीं है कि महिलाएं पूरी तरह शक्तिहीन हैं या पूरी तरह अधिकारों, प्रभाव और संसाधनों से वंचित हैं| इस व्यवस्था की ख़ास बात इसकी विचारधारा है जिसके तहत यह विचार प्रभावी रहता है कि पुरुष स्त्रियों से अधिक श्रेष्ठ हैं और महिलाओं पर पुरुषों का नियन्त्रण है या होना चाहिए| इस व्यवस्था में महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता है|

पितृसत्ता का विभिन्न समाजों, वर्ग तथा जाति में अलग-अलग रूप रहता है तथा इसका रूप गतिशील है क्योंकि यह इतिहास से संबंधित है तथा निरंतर बदलती रही है. अतः समझा जाता है कि यदि स्त्री व पुरुष इसी प्रकार से एक समानतायुक्त समाज के प्रति आंदोलन करते रहे तो इसका अंत संभव है.

‘पितृसत्ता’ का अर्थ (Meaning of Patriarchy)

पितृसत्ता अंग्रेजी शब्द पैट्रियार्की (Patriarchy) का हिंदी अनुवाद है| अंग्रेजी में यह शब्द दो यूनानी शब्दों पैटर और आर्के को मिलाकर बना है| पैटर का मतलब है– पिता और आर्के का मतलब है – शासन| यानी कि ‘पिता का शासन|’ पीटर लेसलेट ने अपनी किताब ‘द वर्ल्ड वी लॉस्ट’ में औद्योगिकीकरण से पहले के इंग्लैण्ड के समाज की परिवार-व्यवस्था की पहली ख़ासियत उसका पितृसत्तात्मक होना बताया है| भारत में इस तरह की परिवार-व्यवस्था (संयुक्त परिवार) आज़ादी के बाद काफी सालों तक बनी रही|

पितृसत्ता का भौतिक अर्थ (Physical Meaning of Patriarchy)

पितृसत्ता एक व्यवस्था के रूप में किस तरह से काम करती है, इस बात को समझने के लिए इसकी विचारधारा को अहम माना गया है| विचारधारा के तौर पर पितृसत्ता की व्यवस्था का मुख्य पहलू महिलाओं में सहमति पैदा करता है| इसके तहत महिलाएं पितृसत्ता को बनाये रखने में मदद करती हैं, क्योंकि समाजीकरण के ज़रिए वो खुद पुरुष वर्चस्व को आत्मसात करके उसके प्रति अपनी सहमति देती है|

उनकी इस सहमति को कई तरीकों से हासिल किया जाता है– जैसे उत्पादक संसाधनों तक उनकी पहुंच का न होना और परिवार के मुखिया पर उनकी आर्थिक निर्भरता| इस तरह अलग-अलग पैंतरों के ज़रिए महिलाओं से पितृसत्ता में उनकी सहमति उगलवा ली जाती है| इस आधार पर यह समझना ज़रूरी हो जाता है कि पितृसत्ता सिर्फ एक वैचारिक व्यवस्था नहीं है बल्कि इसका भौतिक आधार भी है|

पितृसत्ता में महिलाओं को शक्ति और वर्चस्व के साधनों से वंचित करने पर उनकी सहमति आसानी से हासिल कर ली जाती है और जब महिलाएं पितृसत्ता के इशारों पर ज़िन्दगी जीने लगती हैं तो उन्हें वर्गीय सुविधाएँ मिलने लगती हैं और उन्हें मान-सम्मान के तमगों से भी नवाज़ा जाता है| वहीं दूसरी तरफ जो महिलाएं पितृसत्ता के कायदे-कानूनों और तौर-तरीकों को अपना सहयोग या सहमति नहीं देती हैं उन्हें बुरा करार दे दिया जाता है और उन्हें उनके पुरुषों की सम्पत्ति और सुविधाओं से बेदखल कर दिया जाता है|

पितृसत्ता के काम करने का ये तरीका पहले महिलाओं को दो अलग-अलग खेमे (‘अच्छी’ – जो कि पितृसत्ता को सहयोग देती है और ‘बुरी’ – जो कि पितृसत्ता को सहमति नहीं देती है) में बांटकर इन दोनों के बीच कभी खत्म न होने वाले प्रतिस्पर्धा का खेल शुरू कर देता है|

पितृसत्तात्मक व्यवस्था की विशेषताएं (Charactristics of Patriarchy System)

पितृसत्तात्मक व्यवस्था की विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

  1. पितृसत्ता एक सामाजिक प्रणाली है.
  2. यह एक पारिवारिक प्रणाली है जिसमें पुरुष की भूमिकाएँ स्त्रियों की भूमिकाओं से ऊपर होती हैं.
  3. पितृसत्तात्मक व्यवस्था में समाज, अर्थव्यवस्था, राज्यव्यवस्था, धर्म इत्यादि में पुरुष का ही वर्चस्व होता है.
  4. पितृसत्तात्मक व्यवस्था में पुरुष समस्त गतिविधियों का केंद्र बिंदु होता है अर्थात परिवार के समस्त क्रियाएं उसी के चारों ओर घूमती हैं.
  5. पितृसत्तात्मक व्यवस्था में समस्त महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय पुरुषों के द्वारा ही लिए जाते हैं.
  6. इस प्रकार की व्यवस्था में आर्थिक मुद्दों पर पुरुषों का अधिकार होता है.

पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दोष (Demerits of Patriarchy System)

पितृसत्तात्मक व्यवस्था के निम्नलिखित दोष हैं-

  1. पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्रियों की पूर्णतः उपेक्षा होती है जिससे उनके विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है.
  2. ऐसी व्यवस्था में पुरुष अपनी शक्ति का दुरुपयोग भी करता है.
  3. ऐसी व्यवस्था में स्त्रियों को पुरुषों के समकक्ष स्थान नहीं प्रदान किया जाता है.
  4. यह व्यवस्था स्त्रियों की भूमिका की पूर्ण अवहेलना करती है.
  5. इस प्रकार की व्यवस्था में स्त्रियां शोषण एवं उत्पीड़न का शिकार बनती हैं.

उपरोक्त तथ्यों के विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था आधुनिक समय में प्रासंगिक नहीं है क्योंकि आज स्त्रियां प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों के साथ कार्य कर रही हैं तथा देश एवं समाज के विकास में अपना अहम योगदान दे रही हैं. हमारा संविधान भी प्रत्येक नागरिक को समानता का अधिकार प्रदान करता है ऐसे में किसी एक को दबाकर रखने का कोई औचित्य नहीं बनता है.

भारत में ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज (Brahminical Patriarchal Society in India)

भारतीय समाज को पितृसत्ता की व्यवस्था के तहत ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज कहा जाता है क्योंकि यहाँ का समाज जाति-व्यवस्था पर आधारित है| पितृसत्तात्मक व्यवस्था की यह ख़ासियत रही है कि यह समाज के हर सदस्य को एक बराबर न मानकर ऊँचा या नीचा मानता है| इस तरह पितृसत्तात्मक व्यवस्था लोकतान्त्रिक मूल्यों के हमेशा विपरीत रही है| इसमें जाति, लिंग, वर्ण, वर्ग, धर्म जैसे भेद से ऊपर “एक व्यक्ति, एक मत” के सिद्धांत को अपनाकर मानवीय गरिमा को सबसे ऊपर माना गया है|

पित्रसत्ता के विभिन्न पहलू (Different Aspects of Patriarchy)

पितृसत्ता के विभिन्न पहलु निम्नलिखित हैं-

(i). निजी संपत्ति की अवधारणा तथा स्त्री के प्रजनन क्षमता पर नियंत्रण:- हमारा समाज प्रारंभ में कबीलाई या आदिवासी समाज था जहां स्त्री सामान्यतः अधिकार संपन्न थी तथा प्रायः वंश का नाम मां के नाम से चलता था. परंतु जैसे-जैसे समाज कृषि आधारित होता गया व्यक्तिगत या निजी संपत्ति की अवधारणा बढ़ी और पुरुष में सत्ता का लोभ बढ़ता गया. वह अपनी संतान पर स्वामित्व चाहने लगा तथा यह चाहने लगा कि उसकी संपत्ति का उत्तराधिकारी उसकी संतान ही हो. इस व्यवस्था में पुरुष यह चाहने लगा कि उसकी संपत्ति उसकी मृत्यु के बाद उसकी संतान को फिर पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहे. इसके लिए आवश्यक था कि स्त्री की प्रजनन क्षमता पर अधिकार पुरुष का हो. इस प्रकार पितृसत्तात्मक व्यवस्था में जिन पहलुओं पर पुरुषों का नियंत्रण रहता है, उनमें सबसे महत्वपूर्ण उनकी प्रजनन क्षमता होती है.

(ii). श्रम शक्ति पर नियंत्रण:- पितृसत्ता के अंतर्गत पुरुष स्त्रियों की योनिक्ता पर तो नियंत्रण करते ही हैं वे स्त्रियों की श्रमशक्ति पर भी नियंत्रण रखते हैं. इसके अंतर्गत वह सुनिश्चित करते हैं कि स्त्रियां घर में रहकर कार्य करेंगी तथा बाहर पुरुष कार्य करेंगे. घर के अंदर उनकी भूमिका पोषण की रहेगी तथा यदि वे बाहर कार्य भी करेंगे तो पुरुष की मर्जी से. श्रम पर नियंत्रण से बाहर के आर्थिक संसाधनों पर तो पुरुषों का नियंत्रण रहता ही है, उनका स्त्री की योनिक्ता एवं आजादी पर भी नियंत्रण रहता है, क्योंकि इससे औरतों की बाहर आने-जाने की स्वतंत्रता सीमित हो जाती है तथा इसके लिए उन्हें परम्पराओं व रीती रिवाजों की दुहाई दी जाती है तथा वे घर के दायरों तक ही सिमित होकर रह जाती हैं.

(iii). पैतृकवाद:- पैतृकवाद वास्तव में पित्र सत्ता का उपभोग है जिसमें पिता का अपने परिवार के सभी सदस्यों पर पूर्ण नियंत्रण रहता है तथा इसके बदले वह अपने परिवार के सदस्यों को आर्थिक सहायता तथा संरक्षण देता है. पैतृकवाद को बनाए रखने के लिए सभी सदस्यों को यह विश्वास दिलाये रखना जरूरी रहता है कि उनका संरक्षक ही वह एकमात्र व्यक्ति है जो उनकी जरूरतों को पूरा कर सकता है तथा सभी सदस्य इस संरक्षण को प्राकृतिक स्थिति मानकर स्वीकार करते हैं तथा संरक्षक या वर्चस्व वाले व्यक्ति को संतुष्टि होती है कि वह अपने और कमजोर लोगों को पिता के समान संरक्षण दे रहा है.

(iv). पितृसत्ता बनाए रखने में स्त्रियों का सहयोग:- विचारधारा के रूप में पितृसत्ता को एक प्रकार से स्त्रियों का सहयोग प्राप्त होता है. पितृसत्ता को बनाए रखने में स्त्रियां एक प्रकार से सहमति देती हैं, इस समिति को एक प्रकार से कई तरीकों से प्राप्त कर लिया जाता है. पहले तो स्त्रियां आर्थिक रूप से पुरुषों पर आश्रित होती हैं. अतः उनकी बातें मानने को एक प्रकार से बाध्य होती है. इसके अतिरिक्त जो स्त्रियाँ पितृसत्ता की व्यवस्था का अनुकरण करती हैं उन्हें मान-सम्मान भी मिलता है तथा अन्य सुविधाएं भी मिलती हैं. बक्लि जो स्त्रियाँ इस व्यवस्था के कायदे-कानूनों या तौर तरीकों, सहयोग या सहमति नहीं देतीं उन्हें पथभ्रष्ट करार दे दिया जाता है और यह भी संभव है कि उन्हें मिलने वाली आर्थिक सुविधाओं से वंचित कर दिया जाए.

(v). जातिव्यवस्था एवं पितृसत्ता:- पितृसत्ता के ढांचे में जाति तथा जेंडर बहुत महत्वपूर्ण ढंग से जुड़े हुए रहते हैं. प्रारंभ में केवल हिंदू समाज का ही जाति व्यवस्था विशिष्ट अंग थी परंतु अब यह इसाई तथा मुस्लिम समाज में काफी मजबूती से जुड़ी हुई है. जातिवादी नियम की विशेष बात यह है कि यहां एक प्रकार से निम्न जातियों एवं स्त्रियों के उत्पीड़न को वैधानिकता प्राप्त है. जाति व्यवस्था को बनाए रखने में स्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान होता है. यहां जातियों के बीच की सीमा बनी रहती है क्योंकि पितृसत्तात्मक नियम यह सुनिश्चित करते हैं कि विवाह संबंध केवल सजातीय हों तथा इसका उल्लंघन किसी भी दशा में ना हो.

(vi). परोपकारी पैतृकवाद:- दक्षिण एशिया में पितृसत्ता तथा जाति के क्रम को बनाए रखने में स्त्रियों का सहयोग लेने में परोपकारी पैतृकवाद का बड़ा हाथ रहा है. जिसके अंतर्गत "आज्ञाकारी" स्त्रियों को कुछ विशेष अधिकार और सुविधाएं प्रदान की गई हैं, उन्हें सुरक्षा व सम्मान का वस्त्र दिया गया जो कई बार पूजा के स्तर तक चला जाता था. विभिन्न माइथोलॉजी के द्वारा स्त्रियों का इस प्रकार से सामाजिकरण किया जाता है कि वह अपने सबलीकरण के लिए अपनी शुचिता और कर्तव्यपरायणता में विश्वास करने लगती हैं. इस प्रकार पितृसत्तात्मक की विचारधारा को अपनाने के क्रम में स्त्रियां पतिवर्ता तथा पत्नी सुलभ कर्तव्यपरायणता आदि गुण को आत्मसात कर लेती है जिससे स्त्रियों में इन गुणों की आकांक्षा पैदा होती है.

मातृसत्तात्मकत्ता (Matriarchy)

यह एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था होती है जिसमें महिला को केंद्रीय स्थिति प्राप्त होती है. इस व्यवस्था में महिलाएं ही घर की मुखिया होती हैं और उनकी इस केंद्रीय स्थिति का मुख्य कारण निर्णय प्रक्रिया पर महिला का नियंत्रण है. इस व्यवस्था में पुरुषों की स्थिति मुख्य ना हो कर गौण होती है. घर की वस्तुएँ, जमीन, जायदाद आदि महिला के नाम पर ही होती है.

Read also

1 comment

  1. This is more Hindi then I ever needed. It is so hard to speak aloud. So many difficult words.
    But I really like the essay.
© Samar Education All rights reserved. Distributed by SamarEducation