दूर सम्मेलन क्या है? Tele Conferencing in hindi

टेलीकान्फ्रेन्सिंग शब्द जिसे हिन्दी में दूर संवाद प्रणाली या दूर संभाषण प्रणाली का नाम दिया जा सकता है यह उस तन्त्र, प्रणाली या प्रारूप के लिये

दूर सम्मेलन (Tele Conferencing)

दूर सम्मेलन एक ऐसी इलेक्ट्रॉनिक तकनीक है जिसमें दो या दो से अधिक क्षेत्रों में तीन-चार व्यक्ति अथवा विशेषज्ञ किसी समस्या पर अपने विचारों तथा अनुभवों को एकमार्गों या द्विमार्गी सम्प्रेषण द्वारा एक-दूसरे को आदान-प्रदान कर सकते हैं। दूर सम्मेलन की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके सहभागियों के मध्य सूचनाओं के आदान-प्रदान से त्वरित अन्तःक्रिया होने में सहायता मिलती है। इस तकनीक में एकमार्गी-द्विमार्गी, सम्प्रेषण हेतु रेडियो, दूरदर्शन, ब्लैक बोर्ड प्रतिरूप, कम्प्यूटर ग्राफिक्स, टेलीफोन आदि का प्रयोग किया जाता है।

Tele Conferencing

डॉ० कुलश्रेष्ठ एवं सिन्हा के अनुसार, "टेली कॉन्फ्रेन्सिंग या टेली कॉन्फ्रेंस वास्तव में दूर-दूर बैठे हुए दो या दो से अधिक के मध्य वास्तविक समय अन्तःप्रक्रिया होती है।"

दूर सम्मेलन का अर्थ (Meaning of Tele Conferencing)

टेलीकान्फ्रेन्सिंग शब्द जिसे हिन्दी में दूर संवाद प्रणाली या दूर संभाषण प्रणाली का नाम दिया जा सकता है यह उस तन्त्र, प्रणाली या प्रारूप के लिये प्रयुक्त होता है जिसके प्रतिभागी एक दूसरे से काफी दूर होते हुए भी आपस में उचित संवाद या संभाषण कायम रखने में सफल रहते हैं।

बहुत बार आमने-सामने रहकर संवाद या संभाषण प्रक्रिया स्थापित कर पाना संभव नहीं हो पाता। विशेषकर उस स्थिति में जब प्रतिभागी एक-दूसरे से बहुत अधिक दूर हो, इस प्रकार के मिलने में बहुत अधिक समय, पैसा तथा शक्ति के अपव्यय की बात आती हो, तब उस समय आमने-सामने संवाद व्यवस्था कायम करने की बजाय टेली-कान्फ्रेन्सिंग (दूर संवाद प्रणाली) का ही सहारा लेना उपयुक्त रहता है। इस दृष्टि से टेलीकान्फ्रेन्सिंग को हम एक ऐसी संवाद प्रणाली के रूप में परिभाषित कर सकते हैं जिसमें दो या दो से अधिक व्यक्ति किन्हीं दो या दो से अधिक स्थानों पर बैठे हुए किसी इलेक्ट्रोनिक माध्यम की सहायता से उसी प्रकार का सामूहिक संप्रेषण करने में सक्षम होते हैं जैसे कि वे एक-दूसरे के आमने-सामने बैठकर परम्परागत संवाद करते दिखाई देते हैं।

दूर सम्मेलन के विभिन्न प्रकार (Types of Tele Conferencing)

दूर सम्मेलन विधि के तीन प्रमुख प्रकार हैं। ये तीन प्रकार निम्नलिखित हैं-

  1. श्रव्य दूर सम्मेलन
  2. दृश्य-श्रव्य टूर सम्मेलन
  3. कम्प्यूटर दूर सम्मेलन

1. श्रव्य दूर सम्मेलन (Audio Conferencing):- दूर सम्मेलन के लिए जब श्रव्य माध्यमों को प्रयोग किया जाता है, तब इसे श्रव्य दूर सम्मेलन कहा जाता है। दूर शिक्षण संस्थाओं द्वारा श्रव्य दूर सम्मेलनों का ही आयोजन अधिक किया जाता है। श्रव्य दूर सम्मेलन हेतु कई टेलीफोन लाइनों को इलेक्ट्रॉनिक स्विच विधि द्वारा आपस में संयुक्त किया जाता है। ब्रिज के साथ जो श्रव्य उपकरण प्रयोग किये जाते हैं उनमे प्रमुख रूप से हेण्डसेट, हेडफोन, स्पीकरफोन, रेडियो टेलीफोन तथा माइक्रोफोन स्पीकर यूनिट शामिल होते हैं। आकाशवाणी द्वारा कुछ विशिष्ट कार्यक्रमों/प्रायोजकों को दूर सम्मेलन की सुविधा प्रदान की जाती हैं। कुछ व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी अब दूर सम्मेलन की सुविधा दे रहे हैं।

2. दृश्य-श्रव्य टूर सम्मेलन (Video Conferencing):- यह दूर सम्मेलन श्रव्य दूर सम्मेलन की अपेक्षा अधिक उपयोग होता है। इसे दृश्य दूर सम्मेलन के नाम से जाना जाता है, क्योंकि अब वीडियो के साथ-साथ ऑडियो की भी सुविधा उपलब्ध होती है। दृश्य दूर सम्मेलन एकमार्गी अथवा द्विमार्गी भी हो सकता है किन्तु एकमार्गी वीडिये टेलो कॉन्फ्रेंसिंग अधिक प्रचलित है क्योंकि द्विमार्गी सुविधा बहुत अधिक व्ययशील होती है।

वीडियो कॉन्फ्रेन्सिंग के लाभ (Advantages of Video Conferencing)

वीडियो कॉन्फ्रेन्सिंग के निम्नलिखित लाभ होते हैं—

  1. यह विधि अन्य विधियों से कम व्ययशील है।
  2. इस प्रणाली के माध्यम से अनुदेशन सामग्री के स्तर में सुधार लाया जा सकता है और उसे उच्चकोटि का बनाया जा सकता है।
  3. यह प्रत्यक्ष शिक्षण जैसा लाभकारी साधन है।
  4. दूर-दूर तक फैले छात्रों हेतु यह साधन अत्यन्त उपयोगी है।
  5. इस प्रणाली में तत्काल पृष्ठपोषण देना सम्भव है।
  6. यह एक लचीली प्रणाली है जिसमें आवश्यकतानुसार संशोधन या परिवर्तन किया जा सकता है।
  7. इस विधि द्वारा परिसर के बाहर अध्ययन केन्द्रों से सम्पर्क आसानी से बनाया जा सकता है तथा उन्हें केन्द्र द्वारा नियन्त्रित भी किया जा सकता है।

वीडियो कॉन्फ्रेन्सिंग का महत्व (Importance of Video Conferencing)

वीडियो कॉन्फ्रेन्सिंग का महत्त्व निम्न प्रकार है-

  1. यह विधि दूसरी विधियों से कम खर्चीली है।
  2. यह उतना ही लाभकारी साधन है जितना प्रत्यक्ष शिक्षण।
  3. इस प्रणाली में तुरन्त पृष्ठ पोषण देना सम्भव होता है।
  4. व्यापक क्षेत्र में (दूर-दूर तक फैले छात्रों के लिए उपयुक्त है।
  5. इस विधि के माध्यम से परिसर से बाहर के अध्ययन केन्द्रों से सम्पर्क सरलता से बनाया जा सकता है तथा उन्हें केन्द्र द्वारा नियन्त्रित भी किया जा सकता है।
  6. यह खचील प्रणाली है जिसमें आवश्यकतानुसार संशोधन या परिमार्जन अथवा परिवर्तन किया जा सकता है।

वीडियो कान्फ्रेंसिंग की उपयोगिता (Utility of Video Conferencing)

वीडियो कान्फ्रेंसिंग टेली कान्फ्रेंसिंग का एक विधि है, जिसमें दो या दो से अधिक, व्यक्ति श्रव्य दृश्य साधनों का प्रयोग करके टेलीविजन के माध्यम से आवश्यक सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं अथवा किसी विषय पर परस्पर चर्चा करते हैं। इस प्रकार वीडियो कान्फ्रेंसिंग सचित्र सम्प्रेषण का महत्त्वपूर्ण साधन है। इसकी उपयोगिता को निम्न प्रकार स्पष्ट किया गया है—

  1. यह अत्यन्त मितव्ययी है क्योंकि इसमे कम समय और कम धन व्यय होता है।
  2. इसमें छात्रों की शंकाओं का तत्काल समाधान किया जा सकता है और उन्हें अपेक्षित प्रतिपुस्ति दी जा सकती है।
  3. इसके माध्यम से एक शिक्षक एक ही समय में विश्व के अधिसंख्य लोगों की समस्याओं का समाधान सुझा सकता है और किसी प्रकरण पर अपने विचार प्रस्तुत कर सकता है।
  4. यह प्रत्यक्ष एवं सजीव शिक्षण सदृश्य उपयोगी है।
  5. यह सुदूर क्षेत्रों में स्थित व्यक्तियों के लिए आवश्यक सूचनाओं के आदान-प्रदान में सहायक हैं।

3. कम्प्यूटर दूर सम्मेलन (Computer Conferencing):- कम्प्यूटर के माध्यम से भी दूर सम्मेलन की व्यवस्था की जा सकती है। किन्तु इसके लिए बहुत अधिक घन तथा मूल ढाँचे की सुविधाओं की जरूर होती हैं। कम्प्यूटर सूचनाएं भेजी तथा प्राप्त की जाती हैं। दूरस्थ शिक्षा में अभी इसका काफी कम प्रयोग किया जाता है।

दूर सम्मेलन के लाभ (Advantages of Teleconference)

छात्र अधिगम की दृष्टि से दूर सम्मेलन को प्रभावशीलता के सन्दर्भ में के द्वारा बहुत कम अध्ययन किये गये है। अभी तक इस क्षेत्र में जो भी अध्ययन हुए हैं उनमें यही ज्ञान होता है कि टेलीफ़ोन माध्यम आमने-सामने के शिक्षण के समान ही प्रभावी है। सन् 1984 में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय सिम्पोजियम में भी ऑडियो दूर सम्मेलन को शैक्षिक उद्देश्यों के लिए प्रयोग किये जाने पर बहुत अधिक बल दिया गया है। इसका कारण शैक्षिक दूर सम्मेलन से होने वाले विशेष लाभ हैं जो निम्नलिखित हैं-

1. दूर-दराज क्षेत्रों के छात्रों हेतु प्रभावी सहायक साधन:- दूरस्थ शिक्षा प्रणाली के कई उत्साही छात्र दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले होते हैं। इन क्षेत्रों हेतु स्थापित दूरवती शिक्षा के अध्ययन केन्द्रों में छात्रों की संख्या बहुत ही कम होती है। अलग-अलग पाठ्यक्रमों के लिए इन छात्रों की संख्या और कम होती है।। ऐसे दूरस्थी छात्रों हेतु यह प्रविधि काफी उपयोगी साबित हो सकती है।

2. लचीलापन:- इस माध्यम से बड़े अथवा छोटे छात्र समूहों के लिए सहजता से समायोजित किया जा सकता है।

3. त्वरित पृष्ठपोषण:– इसके अन्तर्गत त्वरित पृष्ठपोषण की सुविधा प्राप्त होती है क्योंकि छात्र की अनुक्रिया से शिक्षक तत्काल अवगत हो जाता है तथा यह उसके विचारों की पुष्टि अथवा समर्थन कर सकता है।

4. उच्च गुणवत्ता युक्त अनुदेशन:– इसके अन्तर्गत विषय विशेषज्ञों की अच्छी तैयारी होने पर उच्च गुणवत्ता युक्त अनुदेशन प्रदान किया जा सकता है।

5. परिचित अनुदेशनात्मक विधि:- सेमिनार, परिचर्चा, सामूहिक वाद-विवाद आदि प्रविधियों से परिचित होने के कारण छात्रों के लिए दूर सम्मेलन प्रविधि अनजानी नहीं लगती हैं क्योंकि यह भी अन्य प्रविधियों से मिलती-जुलती है। अतः छात्र एवं अन्य प्रतिभागियों के बीच विविध कोणीय अन्तः क्रिया सम्पन होती है।

6. लागत प्रभावशीलता:- दूरवर्ती छात्रों के लिए शिक्षण की अन्य विधियों की तुलना में ऑडि टेली कॉन्फ्रेंसिंग का व्यय कम आता है। जबकि इसकी प्रभावशीलता अधिक होती है। 7. विविध क्षेत्रीय नियन्त्रण सम्भव - कुछ स्थानीय केन्द्र अथवा कुछ विशिष्ट केन्द्र मिलकर इसका प्रयोग आसानी से कर सकते हैं तथा इसे नियन्त्रित भी कर सकते हैं।

8. सरल संचालन:- दूर सम्मेलन का संचालन काफी आसान होता है।

दूर सम्मेलन की सीमाएँ (Limitations of teleconference)

दूर सम्मेलन प्रविधि की निम्नांकित सीमाएं हैं-

इसमे विशिष्ट ज्ञान की जरूरत होती है।
  1. सभी शैक्षणिक संस्थाएँ कठिनाइयों के कारण दूर सम्मेलन की सुविधा प्रदान नहीं कर सकती हैं।
  2. इसके नियोजन तथा प्रारम्भिक क्रियान्वयन में काफी व्यय आता है।
  3. इसके लिए सम्पूर्ण देश में रेडियो, टेलीविजन एवं टेलीफोन के अत्यधिक क्षमतावान नेटवर्क की आवश्यकता होती है।
  4. इसके माध्यम से किसी विषय विशेष पर ही परिचर्चा की जा सकती है तथा जो छात्र इसमें प्रतिभागी नहीं होता है उसकी कठिनाइयों का निराकरण नहीं हो पाता है।
  5. इसके लिए समस्त प्रतिभागियों की सहमति की आवश्यकता होती है, जिसे प्राप्त करना आसान नहीं है।
  6. यह एक उच्च विकसित तकनीकी प्रविधि है, अतः तकनीकी गड़बड़ी होने पर उसे सुधारने के लिए पर्याप्त समय एवं विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है।

दूर सम्मेलन के अनुप्रयोग (Applications of Teleconference)

दूरस्थ शिक्षा के क्षेत्र में इस तकनीक का विश्व के अधिकांश देशों में किसी-न-किसी रूप में प्रयोग किया जा रहा है। हमारे देश में भी इस तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है। कई विश्वविद्यालयों तथा शैक्षिक संस्थाओं ने शैक्षिक उद्देश्यों के लिए कुछ प्रयोग किये हैं। भारत में किये गये प्रमुख प्रयोग इस प्रकार हैं-

  1. केन्द्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी संस्थान तथा राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद् के संयुक्त तत्त्वाधान से क्लासरूम 2000+ (Class room 2000+) नाम से एक परियोजना पर कार्य किया जा रहा है।
  2. अन्तरिक्ष प्रयोग केन्द्र (Space Application Centres) अहमदाबाद द्वारा दूर सम्मेलन के क्षेत्र में अनेक प्रयोग किये गये हैं। इनके अन्तर्गत उपग्रह एवं भूतलीय सरकिट्स तथा एकमार्गी वीडियो और द्विमार्गों ऑडियो उपकरणों का प्रयोग शैक्षिक एवं प्रेस सम्बन्धी उद्देश्यों हेतु किया गया है।
  3. इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय तथा भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन द्वारा संयुक्त रूप से टेली कॉन्फ्रेसिंग परियोजना का संचालन किया जा रहा है। इग्नू के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रोडक्शन सेण्टर द्वारा इसरो (ISRO) के सहयोग से एकमार्गी वीडियो, द्विमार्गी ऑडियो, उपग्रह आधारित टेली कॉन्फ्रेंसिंग की व्यवस्था की गई है। इस केन्द्र द्वारा सरकारी विभागों, शैक्षिक संस्थाओं तथा अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को निर्धारित शल्क पर टेली कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा प्रदान की जाती है।

टेली कॉन्फ्रेन्सिंग के उपयोग (Use of Teleconferencing)

  1. दूरस्थ शिक्षा के छात्र अपनी उपलब्धियों का स्वयं मूल्यांकन कर सकते हैं।
  2. विभिन्न माध्यम एक-दूसरे के सहायक होते हैं।
  3. छात्र शिक्षकों से सम्पर्क कर अपनी कठिनाइयों के निवारण करने में समर्थ होते हैं।
  4. इसमें पुनर्बलन की व्यवस्था होती है।
  5. ये माध्यम विविध अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक होते हैं।
  6. इनका विशिष्ट अधिगम क्रियाओं में सार्थक तथा प्रभावशाली योगदान होता है।
  7. ये अध्ययन सामग्री को प्रस्तुत करने में लचीलापन लाते हैं।
  8. छात्र इनके प्रयोग से अधिक सक्रिय तथा अच्छी सहभागिता वाले बन जाते है।
  9. इसमें छात्रों की आन्तरिक प्रेरणा तथा जिज्ञासा में वृद्धि होती है जिससे छात्र अधिक सीखते हैं।
  10. ये छात्रों की रुचि, कल्पनाशक्ति तथा ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता में वृद्धि करती है।
  11. इसमें तुरन्त पृष्ठपोषण अवसर होते हैं।
  12. इनका प्रयोग औपचारिक, अनौपचारिक तथा निरोपचारिक सभी क्षेत्रों में किया जाता है।
  13. यह माध्यम व्यक्तिगत उद्देश्यों आवश्यकताओं तथा योग्यताओं को ध्यान में रखकर शिक्षण के व्यक्तिगत बनाने में सहायता देते हैं।

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