शैक्षिक समाजशास्त्र का अर्थ, प्रकृति, उपयोगिता एवं क्षेत्र | Meaning, Nature, Utility and Scope of Sociology of Education in hindi

शैक्षिक समाजशास्त्र का अर्थ, परिभाषा, प्राकृति, उद्देश्य, शैक्षिक समाजशास्त्र का क्षेत्र, आवश्यकता एवं महत्व, शिक्षा पर प्रभाव, जॉर्ज पायने

▶शैक्षिक समाजशास्त्र का अर्थ (Meaning of Educational Sociology)

शैक्षिक समाजशास्त्र (Educational Sociology) शिक्षा और समाज, दो शब्दों से मिलकर बना है जिसका अर्थ होता है "समाजशास्त्र में शिक्षा" या "शिक्षा में समाजशास्त्र का समावेश"। जॉर्ज पैनी (E. George peyne) को शैक्षिक समाजशास्त्र का जनक माना जाता हैं। शिक्षा में समाज के गुणों एवं उसके तत्वों को सम्मिलित करके जिस शिक्षा का निर्माण होता है उसको हम शैक्षिक समाजशास्त्र कहते हैं. शैक्षिक समाजशास्त्र में उन सभी सिद्धान्तों को अपनाया जाता है जो शिक्षा के सिद्धान्तो में अपनाया जाता हैं।

शैक्षिक समाजशास्त्र : अर्थ, प्रकृति, उपयोगिता एवं क्षेत्र (Sociology of Education: Meaning, Nature, utility and Scope)

▶शैक्षिक समाजशस्त्र की परिभाषा (Definition of Educational Sociology)

शैक्षिक समाजशस्त्र की परिभाषाएं अनेक विचारकों ने दी हैं. कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निन्म प्रकार हैं -

हेनसन (Henson) के अनुसार, "उनके अनुसार शैक्षिक समाजशास्त्र शिक्षा तथा समाज के बीच के संबंधों का वर्णन करता हैं।”

जॉर्ज पायने (George Payne) के अनुसार, "शैक्षिक समाजशास्त्र से हमारा अर्थ उस विज्ञान से है जो संस्थाओं सामाजिक समूहों ओर सामाजिक क्रम क्रियाओ अर्थात सामाजिक संबंधों जिनमें तथा जिनके द्वारा व्यक्ति अपने अनुभवों को प्राप्त और संगठित करता है।”

ब्राउन (Brown) के अनुसार, "शैक्षिक समाजशास्त्र व्यक्ति तथा उसे सांस्कृतिक वातावरण के बीच होने वाली अंतर्क्रिया का अध्ययन हैं।”

हमारी दृष्टि से शैक्षिक समाजशस्त्र को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए- "शैक्षिक समाजशास्त्र, समाजशास्त्र की वह शाखा है जिसमें मनुष्य और उसके शिक्षा के स्वरूप की व्याख्या समाजशास्त्र तथ्यों के आधार पर की जाती है और उसकी शिक्षा संबंधित समस्याओं के समाजशास्त्रीय हल प्रस्तुत किए जाते हैं".

▶शैक्षिक समाजशस्त्र की प्राकृति (Nature of Educational Sociology)

  • शैक्षिक समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है और यह समाजशास्त्र की एक शाखा है
  • शैक्षिक समाजशास्त्र सैद्धांतिक (Theoretical) और वस्तुनिष्ठ (Empirical) विषय है
  • शैक्षिक समाजशास्त्र, समाज और शिक्षा के परस्पर संबंध का वैज्ञानिक अध्ययन करता है
  • शैक्षिक समाजशास्त्र सकारात्मकता (Positivism) के दर्शन से प्रभावित है
  • शैक्षिक समाजशास्त्र औपचारिक एवं अनौपचारिक शैक्षिक परिस्थितियों में सामाजिक प्रक्रियायों, सामाजिक प्रतिमानो और समाजशास्त्रीय समस्याओं का वैज्ञानिक अध्ययन है.

▶शैक्षिक समाजशास्त्र के उद्देश्य (Aims of Educational Sociology)

हैरिंगटन (Harington) ने शैक्षिक समाजशास्त्र के अगर लिखित उद्देश्य बताएं हैं-

  • विद्यालय को प्रभावित करने वाले सामाजिक कार्यों का अध्ययन करना.
  • सामाजिक कार्य का अध्ययन करते हुए व्यक्ति पर पड़ने वाले उनके प्रभाव को समझना.
  • सामाजिक आर्थिक तथा सांस्कृतिक प्रवृत्तियों को समझते हुए शिक्षा के पाठ्यक्रम का सामाजिक दृष्टि से नियोजन करना.
  • समाज के संदर्भ में शिक्षक के कार्य का ज्ञान प्राप्त करना और सामाजिक प्रकृति की दृष्टि से विद्यालय के कार्य का ज्ञान प्राप्त करना.
  • लोकतांत्रिक सिद्धांतों को समझना.
  • इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अनुसंधान की विधियों का उपयोग करना.

▶शैक्षिक समाजशास्त्र का क्षेत्र (Scope of Educational Sociology)

शैक्षिक समाजशास्त्र का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है. इसके अंतर्गत जिन विषयों का अध्ययन किया जाता है उनमें प्रमुख विषय निम्न प्रकार हैं-

  • समाज की आवश्यकताओं, परिस्थितियों, समस्याओं और मांगों की अध्ययन करना.
  • सांस्कृतिक वातावरण के संदर्भ में व्यक्ति तथा समाज का अध्ययन करना.
  • विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करना.
  • व्यक्ति और विद्यालय पर समाज के प्रभाव का अध्ययन करना.
  • समाज में शिक्षक के स्थान और महत्व का अध्ययन करना.
  • विद्यालय और स्थानीय सामाजिक संस्थाओं के पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करना.
  • समाज पर शिक्षा के प्रभाव का अध्ययन करना.

▶शैक्षिक समाजशास्त्र की आवश्यकता एवं महत्व (Need and Importance of Educational Sociology)

शिक्षा का कार्य बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है. यह विकास शून्य में नहीं हो सकता. विकास सदैव सामाजिक संबंधों से प्रभावित होता है. बालक के विकास पर उसके परिवार, विद्यालय, समुदाय, संस्कृति आदि का प्रभाव पड़ता है. शैक्षिक समाजशास्त्र में इन सभी का अध्ययन होता है. शिक्षक समाज शास्त्र की आवश्यकता एवं महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट किया जा सकता है-

  • शैक्षिक समाजशास्त्र में सामाजिक समस्याओं को समझते हुए शिक्षा के पाठ्यक्रम का निर्माण किया जाता है।
  • शैक्षिक समाजशास्त्र शिक्षण विधियों के निर्माण में भी सहायक हैं।
  • शैक्षिक समाजशास्त्र शिक्षण सहायक सामग्री के निर्माण में भी अपनी उचित भूमिका निभाता हैं।
  • शैक्षिक समाजशास्त्र विद्यालयों को समाज के साथ जोड़ता हैं।
  • शैक्षिक समाजशास्त्र समाज की आवश्यकताओं एव समस्याओं का अध्ययन करता है तत्पश्चात शिक्षा के उद्धेश्यों का निर्माण किया जाता हैं।
  • शैक्षिक समाजशास्त्र की सहायता से शिक्षा की अवधारणा को समझने में सहायता मिलती हैं।
  • शैक्षिक समाजशास्त्र की सहायता से विद्यार्थियों की समस्याओं को समझने में सहायता मिलती है जिससे यह शिक्षण–अधिगम प्रक्रिया में भी अपनी अहम भूमिका का निर्वहन करता हैं।

▶शैक्षिक समाजशास्त्र का शिक्षा पर प्रभाव (Impact of Educational Sociology on Education)

शैक्षिक समाजशास्त्र के प्रभाव के फलस्वरुप शिक्षा में अनेक परिवर्तन हुए हैं-

  • पाठ्यक्रम में परिवर्तन आना यह शैक्षिक समाजशास्त्र का ही शिक्षा पर प्रभाव हैं।
  • विकलांग व मंदबुध्दि बच्चों की शिक्षा के लिए पर्यटन आरम्भ हुए एवं इनकी शिक्षा की जिम्मेदारी सरकार ने महसूस की।
  • 6 से 14 वर्ष के छात्रों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की शुरुआत की गई।
  • शिक्षा को बाल केंद्रित (Child Centre) बनाया गया।
  • शिक्षण विधियों एवं पाठ्यक्रम को समाज के अनुरूप डिज़ाइन किया गया।
  • शिक्षकों के लिए एक अच्छे प्रशिक्षण की व्यवस्था की गयी।
  • शिक्षा के महत्व को सर्वोपरी स्थान दिया गया।
  • सरकार द्वारा व्यावसायिक शिक्षा पर अधिक बल दिया जाने लगा।
  • शिक्षा को जीविकोपार्जन हेतु तैयार किया गया।

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4 comments

  1. Really thanks
    1. Welcome...!
  2. Thanks
  3. Eske kya disadvantages ho scte h
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