प्रकृतिवाद का अर्थ, परिभाषा, सिद्धांत एवं विशेषताएं | Meaning, Definition, Principles and Characteristics of Naturalism in hindi

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▶ प्रकृतिवाद का अर्थ (Meaning of Naturalism)

प्रकृतिवाद अंग्रेजी शब्द Naturalism शब्द का हिंदी रूपांतरण है जो दो शब्दों के योग से बना हुआ है Natural+ism इसमें Natural का अर्थ 'प्रकृति से संबंधित' है और ism का अर्थ 'सिद्धांत,' इस प्रकार प्रकृति से संबंधित सिद्धांतों का अध्ययन ही प्रकृतिवाद है. प्रकृतिवाद एक व्यवस्था है जिसकी मुख्य विशेषता उस सब को बाहर निकाल फेंकना है जो कुछ आध्यात्मिक है या वास्तव में जो हमारे अनुभव और मानव तथा प्रकृति के दर्शन से परे हो.

दर्शन में प्रकृतिवाद (Naturalism in Philosophy)

▶प्रकृतिवाद की परिभाषा (Definition Of Naturalism)

प्रकृतिवाद की प्रमुख परिभाषाएं इस प्रकार हैं-

✱ जेम्स वार्ड (Jems Ward) के अनुसार– प्रकृतिवाद वह सिद्धांत है जो 'ईश्वर प्रकृति' को ईश्वर से पृथक करता है, आत्मा को पदार्थ के अधीन करता है और अपरिवर्तनीय नियमों को सर्वोच्चता प्रदान करता है.

✱ ब्राइस (Braise) के अनुसार– प्रकृतिवाद एक प्रणाली है और जो कुछ आध्यात्मिक है उसका बहिष्कार ही उसकी प्रमुख विशेषता है.

रस्क (Rusk) के अनुसार- प्रकृतिवाद मानवीय क्रियाओं का कारण जानने और उनकी व्याख्या करने के लिए अतीत पर निर्भर रहता है. वह वस्तुओं को उसी रूप में देख कर संतुष्ट होता है जिसमें वह उनको पाता है और यह उनसे अधिक से अधिक लाभ उठाता है.

थॉमस और लैंग (Thomas and Lang) के अनुसार– प्रकृतिवाद आदर्शवाद के विपरीत मन को पदार्थ के आधीन मानता है और यह विश्वास करता है कि अंतिम वास्तविकता भौतिक हैं, आध्यात्मिक नहीं.

हॉकिंस (Hockins) के अनुसार– प्रकृतिवाद, तत्व मीमांसा का वह रूप है जो प्रकृति को पूर्ण वास्तविक मानता है अर्थात यह परा-प्राकृतिक या दूसरे जगत को अपने क्षेत्र से बाहर रखता है.

▶प्रकृतिवाद का दार्शनिक दृष्टिकोण (Philosophical view of naturalism)

(1). तत्व मीमांसा में प्रकृतिवाद- परमाणु को सत, अनश्वर एवं अविभाज्य मानते हैं. यह परमाणु आकार एवं मात्रा में भिन्न होते हैं. इन्हीं के सहयोग से ब्रह्मांड की रचना होती है. जो दृश्य है वह परमाणु के सहयोग का फल है. प्रकृतिवादियों के अनुसार मनुष्य- इंद्रियों एवं विभिन्न शक्तियों का समन्वित रूप है. सब प्रकृति का खेल है इसमें आत्मा नामक चेतन तत्व नहीं है. संपूर्ण सृष्टि के नियम विद्यमान हैं. सब कार्य नियम अनुसार होते हैं, मनुष्य भी प्रकृति के अधीन है, अर्थात् स्वतंत्र नहीं है. प्रकृति के नियम शास्वत एवं परिवर्तनशील है.

(2). ज्ञान मीमांसा में प्रकृतिवाद- प्रकृतिवादी प्रत्यक्ष का समर्थन करते हैं. यह इंद्रियों तथा अनुभव के माध्यम से ज्ञान की प्राप्ति पर बल देते हैं. वह इंद्रियों द्वारा प्राप्त किए जाने वाले ज्ञान को सत्य मानते हैं. हरबर्ट स्पेंसर इस ज्ञान को निम्न स्तर की ज्ञान से ऊंचा और तत्वज्ञान से निम्न मानता है. तत्वज्ञान पूर्णरूपेण संगठित ज्ञान होता है. इसको स्पेंसर ने सर्वोत्तम प्रकार का ज्ञान बताया है. रूसो ने शिक्षा के सभी स्तरों पर प्रत्यक्ष ज्ञान को महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करने के लिए कहा है.

(3). आचार मीमांसा में प्रकृतिवाद- प्रकृतिवाद प्राकृतिक पदार्थ एवं क्रियाओं को ही सत्य मानता है. इनके अनुसार प्रकृति अपने आप में शुद्ध है और इसके अनुकूल ही मनुष्य को आचरण करना चाहिए, जिससे कि सुख मिले. मनुष्य को अपनी प्रकृति के अनुकूल ही आचरण करना चाहिए. वे मनुष्य को किसी प्रकार से सामाजिक नियमों और आध्यात्मिक बंधनों में बाँध कर नहीं रखना चाहते हैं. मनुष्य को जो कार्य सुख देते हैं वही कार्य वह करेगा. प्रकृतिवादी केवल प्राकृतिक नैतिकता को मानते हैं.

▶प्रकृतिवाद के रूप (Forms of Naturalism)

'प्रकृति' के अर्थ के सम्बन्ध में दार्शनिकों में मतभेद रहा है। एडम्स का कहना है कि यह शब्द अत्यन्त जटिल है जिसकी अस्पष्टता के कारण अनेक भूलें होती हैं। प्रकृति को 3 प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-

  • (1) पदार्थ विज्ञान का प्रकृतिवाद
  • (2) यन्त्रवादी प्रकृतिवाद
  • (3) जीववैज्ञानिक क्रमविकासवादी प्रकृतिवाद

✱ पदार्थ विज्ञान का प्रकृतिवाद (Naturalism of Materials Science)

यह विचारधारा पदार्थ विज्ञान पर आधारित है। इसके अनुसार समस्त प्रकृति में अणु विद्यमान है। जगत की रचना इन्हीं अणुतत्वों से हुई है। जीव और मन सभी का निर्माण भौतिक तत्वों के संयोग से हुआ है। पदार्थ विज्ञान केवल बाह्य प्रकृति के नियमों का अध्ययन करता है और इन्हीं नियमों के आधार पर अनुभव के प्रत्येक तथ्यों की व्याख्या करता है। अतः प्रकृति के नियम सर्वोपरि हैं।

✱ यन्त्रवादी प्रकृतिवाद (Mechanistic Naturalism)

इस सम्प्रदाय के अनुसार सृष्टि यन्त्रवत है जो पदार्थ और गति से निर्मित है। इस प्राणहीन यन्त्र में कोई ध्येय, प्रयोजन या आध्यात्मिक शक्ति नहीं है। मानव यद्यपि इस जगत का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है तथापि उसमें स्वचेतना नहीं होता, उसका व्यवहार वाह्य प्रभावोें के कारण नियंत्रित होता है। ज्यों-ज्यों मानव वाह्य वातावरण के सम्पर्क में आता है, मानव यन्त्र सुचारू रूप से क्रिया करता रहता है। मनुष्य की प्रयोजनशीलता, क्रियात्मकता उसके आत्मिक गुणों की विवेचना इस विचारधारा में संभव नहीं है।

✱ जीववैज्ञानिक क्रमविकासवादी प्रकृतिवाद (Biological Evolution Naturalism)

यह विचारधारा ‘विकास के सिद्धान्त’ में विश्वास रखती है। इसलिए इस विचारधारा का उदगम डार्विन के क्रमविकास सिद्धान्त से हुआ है। इस मत के अनुसार जीवों के क्रम विकास में मनुष्य सबसे अन्तिम अवस्था में है। मस्तिष्क विकास के कारण ही मनुष्य ने भाषा का विकास किया जिसके फलस्वरूप वह ज्ञान को संचित रख सकता है। नये विचार उत्पन्न कर सकता है तथा सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का विकास कर पाया है। अन्य सभी दृष्टियों से मनुष्य अन्य प्राणियों से भिन्न नहीं है। उसकी नियति तथा विकास की संभावनायें वंशक्रम तथा परिवेश पर निर्भर करती हैं।

▶प्रकृतिवाद और शिक्षा (Naturalism and Education)

प्रकृतिवाद का जन्म आदर्शवादी विचारधारा की प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ था. प्रकृतिवाद में कई उप संप्रदाय हैं और मूल रूप से एक होते हुए भी उनमें कुछ भिन्नता है. भौतिक विज्ञान वादी प्रकृतिवाद का शिक्षा के क्षेत्र में कोई प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन यंत्रवादी प्रकृतिवादी तथा जीव विज्ञानवादी प्रकृतिवाद ने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन किए हैं.

शिक्षा में प्रकृतिवाद का आंदोलन बेकन व कमेनियस ने प्रारंभ किया तथा रूसो ने इसे चरम सीमा पर पहुंचाया. प्रकृतिवादी शिक्षा पर क्रमबद्ध विचार हरबर्ट स्पेंसर की पुस्तक "एजुकेशन इंटेलेक्चुअल मोरल एंड फिजिकल" में प्राप्त होते हैं. स्पेंसर क्रमबद्ध सिद्धांत के प्रतिपादक हैं. अतः उनके अनुसार द्रव्य से चेतन आत्मा की उन्नति हुई. फलतः शिक्षा की परिभाषा है- शिक्षा शरीर के अंगों को उन्नत करती है और उन्हें जीवन के योग्य बनाती है.

▶प्रकृतिवाद तथा शिक्षा के उद्देश्य (Objectives of Naturalism and Education)

यन्त्रवादी प्रकृतिवाद ने व्यवहारवादी मनोविज्ञान को जन्म दिया जिसके अनुसार प्रत्येक मनुष्य कुछ सहज क्रियाएं लेकर पैदा होता है। जब ये सहज क्रियाएं बाह्य पर्यावरण के सम्पर्क में आती हैं तो सम्बद्ध सहज क्रियाओं का निर्माण होता है ये सम्बद्ध सहज क्रिया मनुष्य को विभिन्न कार्य में सहायता प्रदान करती हैं। इसलिए यन्त्रवादी प्रकृतिवादी मानव में उचित तथा उपयोगी सम्बद्ध सहज क्रियाएं उत्पन्न करना ही शिक्षा का उद्देश्य मानते हैं।

जीवविज्ञानवादियों के अनुसार प्रत्येक प्राणी में जीने की इच्छा होती है। और अपने जीवन की रक्षा के लिए उसे अपने वातावरण से सदैव संघर्ष करना पड़ता है। डार्विन ने इस सम्बन्ध में दो सिद्धान्त दिये हैं - जीवन के संघर्ष तथा समर्थ का अस्तित्व। इसलिए डार्विन मनुष्य को सामर्थ्यवान तथा शक्तिशाली बनाना चाहते हैं, जिससे जीवन संग्राम में वे सफलता प्राप्त कर सकें। किन्तु लैमार्क के अनुसार वातावरण के अनुरूप परिवर्तन शीलता के गुणों कीशिक्षा देना ही उचित उद्देश्य है।

सुख एंव दुख के सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य सुख प्राप्ति वाले कार्य करता है और दुख देने वाले कार्योंं से बचने का प्रयास करता है। यह बात सही नहीं है क्योंकि मनुष्य कभी कभी कर्तव्य के लिए प्राण भी दे देता है। इस संबंध में टी.पी. नन महोदय का विचार ज्यादा समीचीन प्रतीत होता है। यद्यपि नन महोदय आदर्शवादी विचारधारा के अधिक समर्थक हैं किन्तु शिक्षा के उद्देश्य के सम्बन्ध में उन्होंने जीव वैज्ञानिक एवं प्रकृतिवादी दृष्टिकोण से विचार किया है।

▶प्रकृतिवादी शिक्षा की विशेषताएं (Features of Naturalistic Education)

  1. बाल केंद्रित शिक्षा को प्रोत्साहन
  2. किताबों पर बहुत ज्यादा निर्भरता की आलोचना
  3. प्रकृति के प्रति अनुराग
  4. बच्चों की स्वतंत्रता को महत्व
  5. बच्चों की रुचि को वरियता
  6. प्रकृतिवाद की मान्यता है कि प्रकृति के साथ अंतर्क्रिया में बच्चे की क्षमता और योग्यता का विकास होता है
  7. इन्द्रीय प्रशिक्षण पर बल।

▶प्रकृतिवाद के मूल सिद्धांत (Basic Principles of Naturalism)

प्रकृतिवाद के तत्व मीमांसा, ज्ञान मीमांसा और आचार मीमांसा को हम सिद्धांतों के रूप में इस प्रकार देख सकते हैं-

(1). यह ब्रह्मांड एक प्राकृतिक रचना है- प्रकृतिवादियों के अनुसार संसार का कर्ता और करण दोनों स्वयं प्रकृति ही है. प्राकृतिक तत्वों के सयोंग से पदार्थ और पदार्थों के सयोंग से संसार की रचना होती है. और उनके विघटन से इसका अंत होता है. यह संयोग और विघटन की क्रिया कुछ निश्चित नियमों के अनुसार होती है इसको बनाने और बिगाड़ने को प्राकृतिक परिवर्तन कहा जाता है.

(2).  यह भौतिक संसार ही सत्य- प्रकृतिवाद भौतिक संसार को ही सत्य मानता है. उसका स्पष्टीकरण है कि इस संसार को हम इंद्रियों द्वारा प्रत्यक्ष कर रहे हैं, अतः यह सत्य है. इसके विपरीत आध्यात्मिक संसार को हम इंद्रियों द्वारा प्रत्यक्ष नहीं कर पाते इसलिए वह असत्य है.

(3).  मनुष्य संसार की श्रेष्ठतम रचना- प्रकृतिवाद मनुष्य को जन्म से पूर्ण तो नहीं पर संसार की श्रेष्ठतम रचना मानता है. भौतिक विज्ञानवादी प्रकृतिवाद के अनुसार मनुष्य संसार का श्रेष्ठ्तम पदार्थ है. यंत्रवादी प्रकृतिवाद के अनुसार मनुष्य श्रेष्ठतम यंत्र है और जीव विज्ञानवादी यह संसार का सर्वोच्च पशु है. जीव विज्ञानवादियों के अनुसार मनुष्य ने अपने में निहित कुछ विशेष शक्तियों के कारण अन्य पशुओं से स्वयं सर्वोच्च बना लिया. बुद्धि की महत्वपूर्ण भूमिका है.

(4). मानव विकास एक प्राकृतिक क्रिया है- जीव विज्ञानवादी, प्रकृतिवादी विकास सिद्धांतों में विश्वास रखते हैं. इनके अनुसार मनुष्य का विकास निम्न प्राणी से उच्च प्राणी के रूप में हुआ है. मनुष्य भी कुछ प्रवृत्ति लेकर पैदा होता है. इनका स्वरूप प्राकृतिक है. वाह्य वातावरण से उत्तेजना पाकर यह शक्तियां क्रियाशील होती हैं, और मनुष्य का व्यवहार निश्चित होता है.

(5). प्राकृतिक जीवन ही उत्तम- प्रकृतिवादियों के अनुसार सभ्यता एवं संस्कृति के विकास एवं मोह ने मानव को प्रकृति से दूर किया है. मनुष्य की प्राकृतिक प्रकृति उत्तम है. मानव आत्मरक्षा चाहता है और यह भी चाहता है कि उसके किसी कार्य में बाधा ना आए. मानव की प्रकृति में छल, कपट, द्वेष आदि दुर्गुण नहीं है.

▶प्रकृतिवाद तथा शिक्षक (Naturalism and Teacher)

प्रकृतिवादी शिक्षा में शिक्षक को गौण स्थान प्राप्त है। प्रकृतिवादी विचारक प्रकृति को ही वास्तविक शिक्षिका मानते हैं। उनके विचार से बालक को समाज से दूर रखकर प्राकृतिक वातावरण में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर देना चाहिए। रूसों के अनुसार शिक्षक पर समाज के कुसंस्कारों का प्रभाव इतना पड़ गया होता है कि वह बालकों को सद्गुणी बनाने का प्रयास भले ही कर लें, वह उन्हें सदगुणी बना नहीं सकता क्योंकि वह स्वयं सद्गुणी नहीं है। इसलिए रूसों बालक की आरम्भिक शिक्षा में शिक्षक को कोई स्थान नहीं देना चाहते।

अन्य प्रकृतिवादी रूसो के अतिरेक को स्वीकार नहीं करते। वे बालकों की शिक्षा में शिक्षक की भूमिका मात्र सहायक एवं पथ प्रदर्शक के रूप में मानते हैं। इसलिए शिक्षक को मनोविज्ञान का ज्ञाता होना चाहिये। बालक की मनोकामनाएं, आवश्यकताएं रूचियाँ तथा उनके मानसिक विकास का उसे परिज्ञान होना चाहिए। शिक्षक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह बालक के लिए अनुकूलित वातावरण तैयार करे।

▶प्रकृतिवाद व पाठ्यक्रम (Naturalism and curriculum)

रूमानी प्रकृतिवादी बालक के आरंभिक शिक्षा के लिए किसी औपचारिक पाठ्यक्रम की आवश्यकता का अनुभव नहीं करता है. प्रकृतिवादी भौतिक जीवन को ही सत्य मानते हैं और उसकी रक्षा एवं विकास पर ही सबसे अधिक बल देते हैं. उनके अनुसार पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जो कि बालक के विकास की विभिन्न अवस्थाओं की आवश्यकताऐं पूरी कर सके. इस विचार के प्रमुख प्रवर्तक रूसो ने अपनी रचना एमील में बच्चे के विकास की विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन करते हुए बताया कि शिक्षा को हर अवस्था की विशेषताओं के अनुसार होनी चाहिए. यह अवस्थाएं चार होती हैं-

  • शैशवावस्था- जन्म से 5 वर्ष तक
  • बाल्यावस्था- 5 वर्ष से 12 वर्ष
  • किशोरावस्था- 12 वर्ष से 15 वर्ष
  • युवावस्था- 15 वर्ष से अधिक

✱ शैशवावस्था- यह अवस्था खेलने-कूदने, गिरने, पटकने एवं हर वस्तु को जानने की जिज्ञासा की अवस्था है. शिक्षा स्वाभाविक क्रिया के विपरीत होने की जगह अनुकूल होती है. खिलौने इस समय की शिक्षा के उपयुक्त साधन है.

✱ बाल्यावस्था- यह अवस्था बच्चे की हाथ-पाँव आदि इंद्रियों के विकास की अवस्था है इसलिए शिक्षा का रूप ऐसा हो कि बच्चे की इंद्रियों को खुले रूप में विकसित होने का मौका मिले. प्रकृति वादियों का मानना है कि सबसे पहले ज्ञानेंद्रियां शक्तियुक्त होती हैं इस कारण सबसे पहले इन्हीं कि शिक्षा होनी चाहिए. इंद्रियों का अनुभव इस समय की शिक्षा का माध्यम हो तो अच्छा होगा. प्रकृतिवादियों ने बुरी आदतों से बचने पर जोर दिया इस प्रकार की शिक्षा निषेधात्मक शिक्षा कहलाती है.

✱ किशोरावस्था- इस अवस्था को ज्ञान पाने की व्यवस्था माना गया है. पाने का अभिप्राय स्वयं के प्रयास द्वारा ज्ञान अर्जित करना है. रूसो के अनुसार इस समय तक वह इतना अनुभव पा चुका होता है, अतः नियमित अध्ययन को ही सहज स्वभाविक रूप में पा लेगा. यह समय बौद्धिक एवं शारीरिक क्षमताओं को एक दूसरे का पूरक बनाना वाला होना चाहिए.

✱ युवावस्था- यह अवस्था बच्चे को समाज का अंग बनाने का है. इस समय तक उसमें समाज का एक कुशल नागरिक बनने के गुण व शक्ति आ चुकी होती है. अतः यह अवस्था उसे सामाजिक और नैतिक कर्तव्य से परिचित कराने की सबसे उपयुक्त अवस्था है. रूसो ने इसे हृदय विकास के काल के रूप में देखा है और उसे सामाजिक और भौतिक विज्ञान विषय पढ़ाए जाने की संस्तुति की है.

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