हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दृष्टिकोण | Hardware and Software Approach in Educational Technology in hindi

हार्डवेयर का अर्थ कम्प्यूटर के इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों और मशीनों से है। हार्डवेयर को हम अपनी आंखों मैं देख भी सकते हैं और हाथों से छू भी सकते हैं।

हार्डवेयर का अर्थ (Meaning of Hardware)

हार्डवेयर का अर्थ कम्प्यूटर के इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों और मशीनों से है। हार्डवेयर को हम अपनी आंखों मैं देख भी सकते हैं और हाथों से छू भी सकते हैं। टर्मिनल, सी०पी०यू० प्रिंटर, हार्ड डिस्क, फ्लापी ड्राइव, टेप ड्राइव आदि कम्प्यूटर के हार्डवेयर है। एक तरह से हार्डवेयर कम्प्यूटर का शारीरिक ढाँचा हैं।

Educational Technology

सॉफ्टवेयर का अर्थ (Meaning of Software)

कम्प्यूटर हार्डवेयर को सक्रिय करने अथवा चलने के लिए जिन विशेष निर्देशों की आवश्यकता होती है, उन्हें सॉफ्टवेयर कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, सॉफ्टवेयर उन प्रोग्रामों को कहते हैं जिन्हें हार्डवेयर पर चलाया जाता है। सॉफ्टवेयर के बिना कम्प्यूटर केवल एक निर्जीव मशीन है। इसी के द्वारा कम्प्यूटर में जान डाली जाती है। अत: सॉफ्टवेयर कम्प्यूटर का आत्मा कहा जाता है। दृष्टव्य है कि शरीर और आत्मा पृथक रूप में निरर्थक है, दोनों मिलाकर ही सार्थकता प्राप्त कर सकते हैं।

शैक्षिक तकनीकी के विभिन्न रूप (Different forms of Educational Technology)

हलुम्सडेन ने शैक्षिक तकनीकी को उसकी विषय-वस्तु की प्रकृति के अनुसार तीन रूपों में वर्गीकृत किया है—

  1. शैक्षिक तकनीकी प्रथम या कठोर उपागम,
  2. शैक्षिक तकनीकी द्वितीय या कोमल उपागम,
  3. शैक्षिक तकनीको तृतीय या प्रणाली उपागम।

1. शैक्षिक तकनीकी प्रथम या कठोर शिल्प उपागम (Educational Technology First or Hardware Approach)

इसमें शिक्षण की सहायक सामग्री पर विशेष बल दिया जाता है। यह उपागम इंजीनियरिंग के सिद्धान्त पर आधारित हैं। इसका प्रारम्भ भौतिक विज्ञान तथा अभियन्त्रण तकनीकी की शिक्षण तथा प्रशिक्षण प्रणाली के प्रयोग से हुआ है। दूसरे शब्दों में, कहा जा सकता है कि शिक्षण प्रक्रिया का धीरे-धीरे मशीनीकरण किया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह है कि कम से कम समय में, कम खर्च द्वारा अधिक से अधिक छात्रों को प्रभावशाली ढंग से शिक्षित किया जा सके जिससे अधिकाधिक शिक्षण के उद्देश्यो की प्राप्ति हो सके। इसमें दृश्य-श्रव्य सामग्री का विशेष महत्व है। शिक्षण मशीन ही एकमात्र सहायक सामग्री है जिसका आविष्कार शिक्षण के लिए विशिष्ट रूप से किया जाता है। सिल्वरमैन ने इस तकनीकी को सापेक्षिक तकनीकी का नाम दिया है।

डेविज ने भी स्वीकार किया है कि कठोर उपागम शिक्षण प्रक्रिया का क्रमशः मशीनीकरण करके शिक्षा के द्वारा कम खर्च तथा कम समय में अधिक से अधिक छात्रों को शिक्षित करने का प्रयास किया जा रहा है।

शैक्षिक तकनीकी प्रथम या हार्डवेयर एप्रोच के फलस्वरूप पत्राचार पाठ्यक्रम तथा मुक्त विश्वविद्यालय प्रणाली का जन्म हुआ। अनुसन्धान एवं शोध कार्यों में पपत्रों के संकलन एवं विश्लेषीकरण आदि के लिए मशीनों तथा कम्प्यूटर का उपयोग भी इसी उपागम को महत्त्व देता है। यह एक प्रकार की दृश्य-श्रव्य सामग्री है जो छात्रों में रुचि उत्पन्न करती है और उन्हें क्रियाशील बनाती है।

“शिक्षण प्रशिक्षण में अन्य सहायक सामग्री के अन्तर्गत टेलीविजन, रेडियो, टेपरिकॉर्डर, चलचित्र, प्रोजेक्टर, कम्प्यूटर, बन्द सर्किट टेलीविजन, इलेक्ट्रॉनिक वीडियो टेप, भाषा प्रयोगशाला आदि आते हैं। मशीनों के प्रयोग के द्वारा ही शिक्षा की प्रक्रिया का यन्त्रीकरण हुआ है। मानवीय ज्ञान के तीन पक्ष होते हैं-

  • ज्ञान का संचय
  • ज्ञान का प्रसार
  • ज्ञान का विकास

प्रथम पक्ष ज्ञान को संचित करना है। प्रिन्टिंग मशीनों से पूर्व अधिकांश ज्ञान को कण्ठस्थ किया जाता था और यह ज्ञान शिष्यों को गुरू प्रदान करते थे। परन्तु मशीनों के प्रयोग से ज्ञान को संचित किया जाने लगा है। और आवश्यकता पड़ने पर उसका उपयोग किया जा सकता है।

द्वितीय पक्ष ज्ञान का प्रसार करना है। शिक्षक अपने शिष्यों को संचित ज्ञान प्रदान करता है तथा वह सीमित छात्रों को ही अपने ज्ञान से लाभान्वित कर सकता है परन्तु रेडियो, टेलीविजन, माइक, टेपरिकॉर्डर के प्रयोग से वह असंख्य व्यक्तियों को अपने ज्ञान से लाभान्वित कर सकता है। शैक्षिक तकनीकी के परिणामस्वरूप शिक्षा को प्रक्रिया बदल चुकी है।

मानवीय ज्ञान का तृतीय पक्ष ज्ञान में वृद्धि करना अथवा विकास करना है। शोध कार्यों के द्वारा ज्ञान में वृद्धि की जाती है। आधुनिक युग में वैज्ञानिक शोध कार्यों को अधिक महत्त्व दिया जाता है। शोध कार्यों में आँकड़ों का संकलन करना तथा विश्लेषण करना प्रमुख कार्य है। इसके लिए कम्प्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक कैलकुलेटर तथा बिजली की मशीनों का प्रयोग किया जाता है। मशीनों के प्रयोग ने शोध कार्यों को अधिक सुगम बना दिया है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि ज्ञान के तीन पक्षों में अब मशीनों का प्रयोग होने लगा है। इस प्रकार शिक्षण प्रक्रिया का यन्त्रीकरण हो गया है। शिक्षण की प्रक्रिया के इस यन्त्रीकरण को शैक्षिक तकनीकी प्रथम या हार्डवेयर उपागम कहा जाता है।

डेविड के अनुसार, “यह तकनीकी शिक्षण एवं प्रशिक्षण के लिए अत्यन्त आवश्यक है।"

2. शैक्षिक तकनीकी द्वितीय या मृदुल शिल्प उपागम (Educational Technology II or Software Approach)

इस तकनीकी का आधार मनोविज्ञान है इसलिए इसे व्यवहार प्रणाली या व्यवहार तकनीकी के नाम से जाना जाता है। शैक्षिक तकनीकी द्वितीय में मशीनों का प्रयोग न करके शिक्षण व सीखने के मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का प्रयोग किया जाता है जिससे विद्यार्थियों के व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन लाया जा सके। शिक्षण में पाठ्य वस्तु के निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु शिक्षक विभिन्न प्रकार की विधियों, प्रविधियों, नीतियों तथा युक्तियों आदि का प्रयोग करके छात्रों को सीखने के लिए अनुभव प्रदान करता है जिससे कि उनके व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन हो सके।

मशीनों का प्रयोग केवल पाठ्य वस्तु को प्रभावशाली बनाने के लिए किया जा सकता है। इस तकनीकी को अनुदेशन तकनीकी शिक्षण तकनीकी तथा व्यवहार तकनीकी भी कहते हैं।

प्रो० बी०एफ० स्किनर ने शैक्षिक तकनीकी द्वितीय को व्यवहार तकनीकी पर आधारित माना है। इसी प्रकार ऑर्थर मेल्टन ने कहा है कि शैक्षिक तकनीकी द्वितीय अधिगम के मनोविज्ञान पर आधारित है और यह अनुभव प्रदान करके अपेक्षित व्यवहार परिवर्तन की प्रक्रिया को आरम्भ करती हैं। डेसिको के अनुसार, व्यवहार प्रणाली सीखने के मनोविज्ञान का वैज्ञानिक रोति से व्यवहारिक समस्याओं में प्रयोग है।"

आई०के० डेवीज के अनुसार, "शैक्षिक तकनीकी का मुख्य सम्बन्ध अभिक्रमित अध्ययन के आधुनिक सिद्धान्तों के निकटतम रहा है। इसमें कार्य विश्लेषण उद्देश्यो का संक्षिप्तीकरण करके लेखन, उपयुक्त अधिगम, व्यूह रचनाओं का चयन सही अनुक्रिया के लिए पुनर्बलन तथा सतत् मूल्यांकन निहित है।" इस प्रकार शैक्षिक तकनीकी द्वितीय अथवा सॉफ्टवेयर उपागम में अदा/ लागत (Input), शिक्षण अधिगम प्रक्रिया (Process) तथा प्रदा/ उत्पादन (Output) तीनों पक्षों को विकसित करने का प्रयास किया जाता है।

सिल्वरमैन (Silverman, 1968) ने इस तकनीकी की रचनात्मक शैक्षिक तकनीकी की संज्ञा दो है। शैक्षिक तकनीकी प्रथम एवं शैक्षिक तकनीकी द्वितीय एक-दूसरे से सम्बन्धित है और एक-दूसरे के पूरक कहे जाते हैं। कठोर शिल्प उपागम का तात्पर्य मशीनों से है जबकि कोमल शिल्प उपागम अधिगम तथा शिक्षण के सिद्धान्तों से सम्बंधित होते है बहुत से टवेयर उपागम को हार्डवेयर उपागम ये अधिक महत्वपूर्ण मानते है क्योंकि हार्डवेयर उपागम तब तक उपयोगी नहीं है जब इसमें सॉफ्टवेयर उपागम का प्रयोग न किया जाये।

उपर्युक्त दोनो प्रणालियों में साम्य स्थापित करने के लिए एक अन्य उपागम का योगदान भी महत्त्वपूर्ण है। शैक्षिक तकनीकी को और अधिक महत्त्वपूर्ण बनाने के लिए एक तीसरे पक्ष का अनुसरण किया जाता है। उसे क्रम अथवा प्रणाली उपागम (प्रणाली विश्लेषण) कहते हैं।

यह उपागम शैक्षिक तकनीकी प्रथम एवं शैक्षिक तकनीकी द्वितीय के बीच पुल का कार्य करता है। क्योंकि शिक्षा व्यवस्था से हमारा सम्बन्ध पृथक्-पृथक् रूप से शिक्षक शिक्षण एवं अधिगम से नहीं है वरन् शिक्षण एवं अधिगम दोनों से है। शिक्षण एवं अधिगम तभी सम्भव है जब शिक्षण कार्यबद्ध (व्यवस्थित ढंग से किया जाये। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि शिक्षण कार्य करते समय कक्षा में शिक्षण एवं अधिगम की परिस्थिति उत्पन्न होती है अतः इस प्रकार के दृष्टिकोण ने एक तृतीय प्रत्यय को जन्म दिया जिसे हम प्रणाली विश्लेषण विधि अथवा प्रणाली उपागम के नाम से जानते हैं।

कठोर तथा कोमल तकनीकी में समानताएँ (Similarities Between Hard and Soft Techniques)

कठोर तथा कोमल तकनीकी में निम्नलिखित समानताएँ हैं-

  1. कठोर तथा कोमल दोनों ही तकनीको विषय-वस्तु को अधिक प्राय एवं प्रभावपूर्ण बनाते हैं।
  2. ये दोनों विषय-वस्तु के प्रति छात्रों की रुचि जागृत करने एवं उन्हें प्रेरित करने में सहायक है।
  3. ये दोनों विषय-वस्तु को अधिक आकर्षक, रोचक एवं जीवित बनाने में समर्थ हैं।
  4. ये दोनों छात्रों एवं शिक्षकों के समय शक्ति एवं संसाधनों के समुचित उपयोग में सहायक है।
  5. ये दोनो कम समय एवं कम शक्ति से शिक्षण-अधिगम को अधिकाधिक प्रभावपूर्ण बनाते हैं।
  6. ये दोनों प्रस्तुत पाठ में छात्रों की सहभागिता के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करते हैं।
  7. ये दोनों छात्रों की वैयक्तिक विभिन्नताओं को दृष्टिगत उचित एवं प्रभावपूर्ण शिक्षण विधियों के चयन में सहायता देते है।
  8. ये दोनों पाठ में छात्रों को रुचि विकसित करने और बनाए रखने में सहायक हैं।

हार्डवेयर एवं सॉफ्टवेयर तकनीकी में अंतर (Difference between Hardware and Software Technology)

S.N. हार्डवेयर तकनीकी सॉफ्टवेयर तकनीकी
1. उत्पत्ति- हार्डवेयर तकनीकी की उत्पत्ति भौतिक विज्ञानों और व्यवहारिक अभियान्त्रिकी से हुई है। सॉफ्टवेयर तकनीकी की उत्पत्ति व्यावसायिक विज्ञानों एवं अभिप्रेरणा मनोविज्ञान से सम्बन्धित व्यावहारिक पहलू से हुई है।
2. नामकरण- यह जनसंचार माध्यम तकनीकी है। यह शैक्षिक सन्देश का सम्प्रेषण करने के लिए जनसंचार माध्यमों और सहायक हार्डवेयर के विकास से सम्बन्धित है। सिल्वरमैन इस तकनीकी को 'सापेक्ष तकनीकी' कहते है। यह अनुदेशनात्मक अथवा शिक्षण तकनीकी है। सिल्वरमैन ने इस तकनीकी को 'रचनात्मक शिक्षा तकनीकी' का नाम दिया है।
3. सिद्धान्त- हार्डवेयर तकनीकी का मुख्य सिद्धान्त पृष्ठ पोषण का होता है जिसे साइबरनेटिक मनोविज्ञान भी कहा जाता है। सॉफ्टवेयर तकनीकी में मौलिक और सामाजिक अधिनियमों का उपयोग होता है। पुनर्बलन तथा पृष्ठपोषण दोनों का ही उपयोग किया जाता है।
4. अवधारणा- मानव मशीन की भांति कार्य करता है। मानव व्यवहार में पृष्ठ पोषण प्रविधि प्रयुक्त की जाती है। इससे अपेक्षित व्यवहार परिवर्तित किया जाता है। मानव व्यवहारों में परिवर्तन किया जा सकता है। वे सापेक्ष होते हैं। उनका मापन किया जा सकता है। मानव को कोई प्रणाली सम्पूर्ण अथवा सम्पन्न नहीं है। उसमें विकास की आवश्यकता है।
5. माध्यम- मशीनों के उपयोग से प्रसारण में सहायता मिलती है। अध्यापक और छात्र की दूरी कम होती है। दूरवर्ती शिक्षण किया जाता है। शिक्षा का वैकल्पिक रूप दूरवर्ती शिक्षा माध्यम के उपयोग की देन है। मुक्त विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई है।
6. उत्पादन एवं उपयोग- हम हार्डवेयर तकनीकी में अध्यापकों और शिक्षार्थियों की उनके कार्य में सहायता करने के लिए दृश्य-श्रव्य सामग्री और उच्च रूप से विकसित उपकरणों और जनसंचार माध्यमों के उत्पादन एवं उपयोग से सम्बन्धित होते हैं। हम सॉफ्टवेयर तकनीकी में सीखने की सामग्री, शिक्षण अधिगम प्रविधियों और शिक्षण अधिगम को सुविधापूर्ण बनाने के लिए अन्य साधनों के सम्बन्ध में सॉफ्टवेयर तकनीकी और सामग्रियों के उत्पादन और उपयोग के लिए अधिगम मनोविज्ञान का उपयोग करने का प्रयास करते हैं।

3. शैक्षिक तकनीकी तृतीय या प्रणाली विश्लेषण (Educational Technical III or System Analysis)

इसका विकास द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् हुआ। इसमें प्रशासन, प्रबन्ध, व्यापार तथा सेना आदि से सम्बन्धित समस्याओं के विषय में निर्णय लेने के लिए वैज्ञानिक आधार रहता है। इसलिए इस उपागम को प्रबन्ध तकनीकी उपागम भी कहा जाता है। उपागम का शिक्षा के क्षेत्र में शैक्षिक प्रबन्ध की समस्याओं का क्रमबद्ध अध्ययन करने में प्रयोग किया जाता है। दूसरे शब्दों में, शैक्षिक तकनीकी तृतीय शैक्षिक प्रशासन के विकास तथा अनुदेशन की रूपरेखा बनाने में पूर्ण सहयोग प्रदान करती है।

इस प्रणाली अथवा उपागम के उपयोग से शैक्षिक व्यवस्था कम खर्च में अधिक उपयोगी तथा प्रभावशाली बन जाती है। इस तकनीकी या उपागम को गणित एवं विज्ञान पर आधारित मानते हैं। इस उपागम के अन्तर्गत प्रणाली विश्लेषण, प्रशिक्षण मनोविज्ञान, सम्प्रेषण नियन्त्रण प्रारूप, पुनर्बलन भी सम्मिलित है। इस तकनीकी का जन्म शैक्षिक तकनीकी प्रथम एवं शैक्षिक तकनीकी द्वितीय के मेल के फलस्वरूप हुआ-

कठोर तथा कोमल शिल्प उपागम के उपयोग, आवश्यकता तथा महत्त्व (Uses, Need and Importance of Hard and Soft Approach)

  1. ये छात्रों की व्यक्तिगत भिन्नता को ध्यान में रखकर उचित शिक्षण प्रणालियों का उपयोग पाठ्य-वस्तु को प्रभावशाली बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं।
  2. ये दोनों उपागम अध्यापकों तथा विद्यार्थियों के समय, शक्ति तथा स्रोतों का सही उपयोग करने में सहायक होते हैं।
  3. ये दोनों उपागम पाठ्य वस्तु को अधिक स्पष्ट, ग्राह्य तथा सरल बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
  4. इन दोनों उपागमों का प्रयोग छात्रों को जिज्ञासु बनाने पाठ्य वस्तु के प्रति रुचि जाग्रत करने तथा उन्हें प्रेरित करने के लिए किया जाता है।

शैक्षिक तकनीकी द्वितीय अथवा सॉफ्टवेयर उपागम प्रयोग के मानदण्ड (Criteria for Using Educational Technology II or Software Approach)

शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कोमल शिल्प उपागम को निम्नलिखित मानदण्डों के अनुरूप होना चाहिए-

  1. कोमल शिल्प पाठ्य-वस्तु के अनुकूल हो।
  2. विषय-वस्तु शुद्ध, सुसंगठित तथा प्रस्तावित समूह, आयु एवं वृद्धि स्तर के अनुकूल हो।
  3. विभिन्न माध्यमों का उपयुक्त प्रयोग किया गया हो।
  4. यह अन्तःसक्रिय हो जो छात्रों को सम्मिलित करने में सक्षम हो ।
  5. पर्याप्त दस्तावेज तथा उपयुक्त सहायक सामग्री हो।
  6. इसके लिए छात्रों को कम्प्यूटरिंग का गहनता से अध्ययन करना आवश्यक न हो।
  7. कम्प्यूटर का विवेकपूर्ण अध्ययन किया गया हो।

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