मानव विकास की अवस्थाएं | बाल्यावस्था एवं किशोरावस्था | Stages of Human Development

बाल्यावस्था में विकास, विशेषताएं, शारीरिक विकास, भाषा का विकास, सांवेगिक विकास, सामाजिक विकास, किशोरावस्था में विकास, किशोरावस्था की विशेषताएं

▶मानव विकास की अवस्थाएं (Stages of Human Development)

मानव विकास एक सतत प्रक्रिया है. जहां तक उसकी शारीरिक बुद्धि की बात है तो वह एक सीमा (परिपक्वता, Maturity) को प्राप्त करने के बाद रुक जाती है परंतु उसकी मनोशारीरिक क्रियाओं में विकास निरंतर होता रहता है. और इसके साथ ही उसका मानसिक, भाषायी, संवेगात्मक, सामाजिक और चारित्रिक विकास निरंतर होता रहता है. यह सब विकास उसके विभिन्न आयु स्तरों पर भिन्न-भिन्न रूप में होता है. इन आयु स्तरों को ही मानव विकास की अवस्थाएं कहते हैं. भारतीय मनीषियों ने मानव विकास की अवस्थाओं को 7 कालों में विभाजित किया है. भारत में आज भी मनुष्य जीवन को इन्हीं 7 कालों में विभाजित करके देखा-समझा जाता है. यह 7 अवस्थाएं निम्नलिखित है-

  1. गर्भावस्था - गर्भाधान से जन्म तक
  2. शैशवावस्था - जन्म से 5 वर्ष तक
  3. बाल्यावस्था - 5 वर्ष से 12 वर्ष तक
  4. किशोरावस्था - 12 वर्ष से 18 वर्ष तक
  5. युवावस्था - 18 वर्ष से 25 वर्ष तक
  6. प्रौढ़ावस्था - 25 वर्ष से 55 वर्ष तक
  7. वृद्धावस्था - 55 वर्षों से मृत्यु तक
मानव विकास की अवस्थाएं (Stages of Human Development)

पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक कॉलसनिक (Kolesnik) ने मानव विकास की अवस्थाओं को 8 वर्गों में विभाजित किया है, रॉस (Ross) ने मानव विकास की प्रक्रिया को केवल 4 अवस्थाओं में विभाजित किया है और सेले (Selley) मानव विकास का अध्ययन केवल 3 अवस्थाओं में करने के पक्ष में हैं. हमारी दृष्टि से ये सभी विभाजन अपूर्ण और भ्रामक हैं क्योंकि मानव विकास जन्म से मरण तक होता है, जिसमें सभी अवस्थायें शामिल होनी चाहिए. अर्नेस्ट जोंस (Ernest Jones) ने इन सभी कमियों को दूर किया और मानव विकास की अवस्थाओं को निम्नलिखित चार अवस्था में विभाजित किया. इस समय अधिकतर विद्वान मानव विकास का अध्ययन इन्हीं 4 अवस्थाओं के अंतर्गत करते हैं-

  1. शैशवावस्था (Infancy) - जन्म से 6 वर्ष तक
  2. बाल्यावस्था (Childhood) - 6 वर्ष से 12 वर्ष तक
  3. किशोरावस्था (Adolescence) - 12 वर्ष से 18 वर्ष तक
  4. वयस्कावस्था (Adulthood) - 18 वर्ष से मृत्यु तक

शिक्षा मनोविज्ञान में बाल्यावस्था से परिवर्ती किशोरावस्था तक का महत्व अधिक बताया गया है. अतः इन्हीं अवस्थाओं में, हम बालकों में होने वाले विभिन्न तरह के विकास शारीरिक विकास, मानसिक विकास, सामाजिक विकास, संवेगात्मक विकास आदि का विस्तृत अध्ययन करेंगे.

▶बाल्यावस्था में विकास (Development in Childhood)

यह आवस्था 2 साल से प्रारंभ होकर 12 साल तक की होती है. इसे मनोवैज्ञानिकों ने निम्नांकित दो भागों में बांटा है-

(1). प्रारंभिक बाल्यावस्था में विकास- प्रारंभिक बाल्यावस्था अवस्था 2 वर्ष से प्रारंभ होकर 6 वर्ष तक की होती है. इसे शिक्षकों द्वारा प्राकस्कूल अवस्था (Preschool Age) या प्राकटोली अवस्था (Pregang Stage) भी कहा जाता है. इस अवस्था में बालकों में महत्वपूर्ण शारीरिक विकास भाषा विकास, प्रत्यक्षणात्मक एवं संज्ञानात्मक विकास, बौद्धिक विकास, सामाजिक विकास तथा सांवेगिक विकास होते पाया है. प्रारंभिक बाल्यावस्था की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  • प्रारंभिक बाल्यावस्था एक समस्या अवस्था होती है.
  • प्रारंभिक बाल्यावस्था में बालकों के अभिरुचि खिलौनों से अधिक होती है.
  • प्रारंभिक बाल्यावस्था को शिक्षकों द्वारा तैयारी का समय बताया गया है.
  • प्रारंभिक बाल्यावस्था में बालकों में उत्सुकता अधिक होती है.
  • प्रारंभिक बाल्यावस्था में बालकों में अनुकरण करने की प्रवृत्ति अधिक तीव्र होती है.

(2). उत्तर बाल्यावस्था में विकास-उत्तर बाल्यावस्था 6 वर्ष से प्रारंभ होकर बालिकाओं में 10 वर्ष की उम्र तक तथा बालकों में 12 वर्ष की उम्र तक होती है. यह वह अवस्था होती है जहां बालक स्कूल जाना प्रारंभ कर देते हैं. इस अवस्था को माता-पिता, शिक्षकों तथा अन्य वैज्ञानिकों द्वारा उत्पाती अवस्था (Troublesome age), प्रारंभिक स्कूल अवस्था (Elementary School Age) और गिरोह अवस्था (Gang Age) कहा गया है. इस अवस्था में भी बालकों में महत्वपूर्ण शारीरिक विकास, भाषा विकास, सावेगात्मक विकास, सामाजिक विकास, मानसिक विकास तथा संज्ञानात्मक विकास होते हैं, जिनका ज्ञान होने से शिक्षक आसानी से बालकों का मार्गदर्शन कर पाते हैं. उत्तर बाल्यावस्था की विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

  • उत्तर बाल्यावस्था को माता-पिता द्वारा एक उत्पाती या उद्यमी अवस्था कहा गया है.
  • उत्तर बाल्यावस्था में बालकों में लड़ाई-झगड़ा करने की प्रवृत्ति भी अधिक होती है.
  • शिक्षकों द्वारा उत्तर बाल्यावस्था को प्रारंभिक स्कूली अवस्था कहा जाता है.
  • उत्तर बाल्यावस्था में बालक अपने ही उम्र के साथियों के समूह द्वारा स्वीकृति पाने के लिए काफी लालायित रहता है.
  • उत्तर बाल्यावस्था में बालकों में सर्जनात्मक क्रियाओं की ओर अधिक झुकाव होता है.

बाल्यावस्था में होने वाले प्रमुख विकास को का वर्णन निम्नांकित है-

▶(1). बाल्यावस्था में शारीरिक विकास (Physical development in Childhood)

जन्म से 6 वर्ष तक की अवस्था में शारीरिक विकास सिर से प्रारंभ होकर पैरों व हाथों की ओर जाता है।सिर का भार जो जन्म के समय 350 ग्राम होता है, 6 वर्ष की आयु तक 1250 ग्राम हो जाता है और 10 वर्ष की आयु में मस्तिष्क का भार शरीर का आठवां हिस्सा हो जाता है। 6 वर्ष की आयु में ऊंचाई लगभग 43 इंच और भार 12 पौंड हो जाता है।

बाल्यावस्था तक लंबाई में तीव्र गति से वृद्धि होती है, भार पर्याप्त मात्रा में बढ़ता है। 12 वर्ष तक के बालक-बालिकाओं का भार 85-95 पौण्ड के लगभग हो जाता हैं अर्थात बालकों की तुलना में बालिकाओं का भार ज्यादा होता है।

बाल्यावस्था में हड्डियों की संख्या 270 से बढ़कर 350 तक हो जाती है और उनमें वृद्धा आ जाती है। 6 वर्ष की अवस्था तक चार दाढ़े व 8 काटने वाले दाँत आ जाते हैं उसके बाद स्थाई दांत आ जाते हैं। 12 वर्ष की आयु तक 25 दांत निकल आते हैं। बाल्यावस्था तक बालक का मांसपेशियों पर नियंत्रण हो जाता है और इनका भार शरीर का 26% हो जाता है। इस अवस्था में बालक अपनी शारीरिक गति पर नियंत्रण करना सीख जाता है और अपने कार्य स्वयं करने लगता है।

▶(2). बाल्यावस्था में भाषा का विकास (Language development in Adulthood)

जन्म के समय शिशु क्रन्दन करता है। यही उसकी पहली भाषा होती है। इस समय उसे न तो स्वरों का ज्ञान होता है और न व्यंजनों का। 25 सप्ताह तक शिशु जिस प्रकार की ध्वनियाँ निकालता है, उनमें स्वरों की संख्या अधिक होती है। 10 मास की अवस्था में शिशु पहला शब्द बोलता है, जिसे बार-बार दोहराता है। एक वर्ष तक शिशु की भाषा समझना कठिन होता है। केवल अनुमान से ही उसकी भाषा समझी जा सकती है।

आयु के साथ-साथ बालकों के सीखने की गति में भी वृद्धि होती है। प्रत्येक क्रिया के साथ विस्तार में कमी होती है। बाल्यकाल में बालक शब्द से लेकर वाक्य विन्यास तक की सभी क्रियाएँ सीख लेता है। भाषा के विकास में समुदाय, घर, विद्यालय और परिवार की आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थिति का प्रभाव अत्यधिक पड़ता है। वस्तुओं को देखकर उसका प्रत्यय-ज्ञान बालक को हो जाता है और उसके पश्चात् उसे उसकी अभिव्यक्ति में भी आनन्द प्राप्त होता है। प्रत्यय-ज्ञान स्थूल से सूक्ष्म की ओर विकसित होता है। इसी प्रकार भाषा का ज्ञान भी मूर्त से अमूर्त की ओर होता है।

▶(3). बाल्यावस्था में सांवेगिक विकास (Emotional development in Adulthood)

पूर्व बाल्यावस्था में प्रायः सुख एवं दु:ख दो ही अनुभव बालकों को होते हैं। आयु-वृद्धि के अनुसार वे बढ़ते रहते हैं। 6 वर्ष की आयु में बालक में भय क्रोध के संवेग आ जाते हैं, जिन्हें वह अपनी क्रियाओं से अभिव्यक्त कर देता है।वाटसन के अनुसार - वाटसन ने बालक में 4 प्रकार के संवेग बताएं है। बालक में सर्वप्रथम भय, क्रोध एवं प्रेम के संवेग प्रकट होते हैं जिन्हें उसकी मुस्कुराहट में, चिल्लाहट में, और हंसी में देखा जा सकता है।

प्रारंभ में बालक अपने संवेगों को लाक्षणिक रूप में अभिव्यक्त करता है। जैसे बालक खिलखिलाता है, हँसता है, फड़कता है, जमीन पर लोटता है और कई बार आकुलता का भी अनुभव करता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार ये क्रोध, प्रेम और भय के लक्षण हैं।

उत्तर बाल्यावस्था में पाए जाने वाले मुख्य संवेग भी प्रायः भय, क्रोध, ईर्ष्या, जिज्ञासा, स्नेह और हर्ष ही है, किंतु पूर्व के संवेगों की तुलना में इसमे मुख्य अंतर यह होता है कि एक तो उनकी उद्दीप्त करने वाली परिस्थितियां भिन्न होती हैं और उन संवेगों की अभिव्यक्ति का रूप अलग होता है।

बालक अपने क्रोध, भय, प्रेम आदि संवेगों को अपने आसपास के व्यक्तियों, वस्तुओं एवं परिस्थिति के प्रति प्रतिक्रिया करके व्यक्त करते हैं। बड़े होने पर संवेगों पर नियंत्रण भी पाया जाता है। बड़े होने पर बालक में सामूहिकता का विकास हो जाता है और वह अपने साथियों के साथ स्नेह, घृणा, हर्ष, क्रोध आदि व्यक्त करने लगता है।

▶(4). बाल्यावस्था में सामाजिक विकास (Social development in Adulthood)

सामाजिक विकास की प्रक्रिया करीब 2 माह की अवस्था से प्रारंभ होती है। 2 वर्ष की आयु में बालक अन्य बालकों की ओर आकृष्ट हो जाता है, परस्पर खेलता है, उसमें सहयोग की भावना का विकास होने लगता है। 3-4 वर्ष की अवधि में नकारात्मकता के गुण बालक में आ जाते हैं। कुंठा, निराशा, आक्रामक व्यवहार करने लगता है। वह आत्मकेंद्रित व झगड़ालू हो जाता है, किंतु 6 वर्ष की अवस्था आने पर उसमें सामूहिकता की भावना विकसित होने लगती है।

इस अवस्था में उसका सामाजिक परिवेश बढ़ जाता है। अतः बाल्यावस्था को 'टोली की आयु' (age of gang) कहा गया है। क्योंकि बालक की रुचि समवयस्कों के साथ क्रियाकलाप करने की हो जाती है। वह अब घर से बाहर खेलना पसंद करता है। वह अपने स्कूल व पड़ोस के सामाजिक जीवन में समायोजन करने का प्रयास करता है। बाल्यावस्था की टोली समलिंगीयों की होती है। टोली का प्राय: एक केंद्रीय स्थान होता है जहां सब मिलते हैं। इस प्रकार टोली के माध्यम से बालक नवीन वातावरण के साथ अनुकूलन करना तथा बालकों के साथ मित्रता करना सीख लेता है। बालक टोली के मानकों के अनुसार काम करने लगता है।

टोली के संपर्क से बालक दूसरों से प्रतियोगिता करना, सहयोग देना और काम करना, जिम्मेदारियां संभालना और निभाना, जब दूसरों से दुर्व्यवहार किया जाता हो या उनकी उपेक्षा की जाती हो तब उसका पक्ष लेना और संपत्ति विपत्ति दोनों में अपना संतुलन बनाए रखना सीख लेता है। टोली में समाजीकरण का जो प्रशिक्षण मिलता है, उसकी प्राप्ति का इसके अलावा अन्य कोई साधन नहीं है। इस प्रकार टोली साहस, न्याय, आत्मनियंत्रण, सद्भाव एवं नेता के प्रति आदर आदि गुणों का विकास करती है।

इसी अवस्था में बालकों में 'ऑडीपस' और 'इलेक्ट्रा' ग्रंथियां विकसित होने लगती हैं। 'ऑडीपस' ग्रंथि से अभिप्राय है कि लड़के अपनी माता से अधिक प्रेम  करने लगते हैं और 'इलेक्ट्रा' ग्रंथि से तात्पर्य है कि लड़कियां अपने पिता से अधिक प्रेम करती है। एक और भावना का विकास इस समय होता है वह है 'वीर पूजा'। इसका अर्थ है कि जो बालक टोली के अन्य सदस्यों से बुद्धि में, विश्वसनीयता में, शक्ल-सूरत में, लोकतंत्रीय आदर्शों की दृष्टि से, आत्मविश्वास में, खेलकूद संबंधी योग्यता में तथा दूसरों की इच्छाओं को पहचानने में श्रेष्ठ होता है- उसके प्रति अन्य बालक वीर पूजा का भाव अपना लेते हैं।

▶(5). बाल्यावस्था में मानसिक विकास (Mental development in Childhood)

पूर्व बाल्यावस्था में बालक के मानसिक विकास का माध्यम ज्ञानेंद्रियां होती हैं। धीरे-धीरे वह अपनी जिज्ञासा की शांति के लिए अनेक प्रकार के प्रश्न करता है। भाषा पर उसका अधिकार होने लगता है। स्मरणशक्ति में वृद्धि हो जाती है। वातावरण की वस्तुओं के नाम बताने, कहानी, कविता सुनाने एवं अपनी रुचि के अनुसार सीखने की इच्छा बढ़ जाती है। समस्या का चिंतन करके कारण व निदान खोजने का प्रयास करने लगता है। रटने की योग्यता विकसित हो जाती है। 6 से 12 वर्ष की आयु में उसमें दाएं-बाएं का ज्ञान, 14-15 वस्तुओं को गिनने व सरल प्रश्नों के उत्तर देने कि क्षमता का विकास हो जाता है। 8 से 11 वर्ष की आयु में बालक का भाषा संबंधी विकास इतना हो जाता है कि वह छठी कक्षा तक लगभग पचास हजार शब्द जान जाता है। सही व सटीक जटिल वाक्य बना लेता है। इस अवस्था में अवधान का विकास भी खूब हो जाता है।

ालक रंगबिरंगी वस्तुओं, तेज आवाज के प्रति अधिक आकर्षित रहता है। उसमें चिंतन तर्क और निर्णय लेने की क्षमता विकसित हो जाती है। वह ठोस वस्तुओं के बारे में तर्क करने लगता है। 12 वर्ष की अवस्था तक बालक किसी बात का कारण बता सकता है तथा अपनी ओर से व्याख्या कर सकता है।

▶किशोरावस्था में विकास (Development in Adolescence)

शिक्षा मनोविज्ञानको ने किशोरावस्था को अधिक महत्वपूर्ण अवस्था बताया है. और अधिकतर शिक्षक इस बात से सहमत हैं कि उन्हें अपने शिक्षण कार्य में सबसे अधिक चुनौती इस अवस्था के शिक्षार्थियों से प्राप्त होती है. किशोरावस्था 13 साल की उम्र से प्रारंभ होकर 19-20 साल तक की होती है और इस तरह से इस अवधि में तरुणावस्था या प्राककिशोरावस्था (Preadolescence), प्रारंभिक किशोरावस्था (Early Adolescence) तथा उत्तर किशोरावस्था (Later Adolescence) तीनों सम्मिलित हो जाते हैं.

किशोरावस्था की विशेषताएं (Characteristics of Adolescence)

किशोरावस्था की विशेषताएं निम्नांकित है-

  • किशोरावस्था को एक महत्वपूर्ण अवस्था माना गया है.
  • किशोरावस्था एक परिवर्ती अवस्था होती है.
  • किशोरावस्था में एक अस्पष्ट व्यक्तिक स्थिति होती है.
  • किशोरावस्था एक समस्या उम्र होती है.
  • किशोरावस्था विशिष्टता की खोज का समय होता है.
  • किशोरावस्था अवास्तविकताओं का समय होता है.
  • किशोरावस्था वयस्कावस्था की दहलीज होती है.

▶(1). किशोरावस्था में शारीरिक विकास (Physical development in Adolescence)

किशोरावस्था के शुरुआती यौन अंगों के परिपक्वन से होता है. इस अवस्था के लड़के एवं लड़कियां दोनों के शारीरिक वजन एवं ऊंचाई में महत्वपूर्ण परिवर्तन आते हैं. लड़कियों ने 11-14 साल की उम्र में इसी उम्र के लड़कों की अपेक्षा अधिक लंबी एवं वजनयुक्त होती हैं, परंतु 16 साल के बाद लड़कों का वजन समान उम्र की लड़कियों से अधिक होता है. और यह अंतर जिंदगी के बाकी सालों में भी ऐसा ही बना रहता है. शारीरिक विकास के अंतर्गत लड़कियों में स्तन वृद्धि, आवाज में मधुरता आदि के रूप में परिवर्तन दिखाई देते हैं तथा लड़कों में मूंछ-दाढ़ी निकल जाना, आवाज भारी हो जाना आदि परिवर्तन दिखाई देते हैं.

▶(2). किशोरावस्था में सांवेगिक विकास (Emotional development in Adolescence)

किशोरावस्था में शारीरिक तनाव अपनी चरम सीमा पर होता है, क्योंकि इस अवस्था में बालकों में जबरदस्त शारीरिक तथा ग्रंथियों परिवर्तन, खासकर यौन ग्रंथि तथा पीयूष ग्रंथि के कार्य में परिवर्तन होते हैं. मनोवैज्ञानिकों ने किशोरावस्था को आंधी और तनाव की अवस्था कहा है. इस अवस्था के 13-14 साल के बालक और बालिकाओं दोनों में ही क्रोध के संवेग की तीव्रता अधिक होती है, परंतु 18-19 साल होते होते क्रोध की तीव्रता में कमी आ जाती है; क्योंकि अब वह शारीरिक रूप से परिपक्व हो जाते हैं. और अपने संवेगों को नियंत्रित कर सामाजिक रूप से अभिव्यक्त करना सीख लेते हैं.

▶(3). किशोरावस्था में सामाजिक विकास (Social development in Adolescence)

किशोरावस्था में लड़के और लड़कियां दोनों को सामाजिक समायोजन के कई पहलुओं को सीखना पड़ता है ताकि वे एक पूर्ण सामाजिक प्राणी के रूप में स्वीकृति किए जा सकें. इस अवस्था में चूँकि बालक अपना अधिक समय अपने साथियों के समूह में व्यतीत करते हैं. अतः उनकी मनोवृत्ति, अभिरुचि तथा व्यवहार पर साथियों को प्रभाव अधिक पड़ता है. इस अवस्था में लड़के तथा लड़कियां विपरीत लिंग के व्यक्तियों के साथ स्वतंत्र रूप से मिलना जुलना अधिक पसंद करते हैं. अब वे विपरीत लिंग के व्यक्तियों तथा समलिंगी व्यक्तियों को सही संदर्भ में परखते हैं. इससे उनमें सामाजिक सूझ-बूझ विकसित होती है और सामाजिक संयोजन में मदद मिलती है. इस अवस्था में लड़के-लड़कियां माता-पिता के प्रतिरोधों से स्वतंत्र होकर काम करना चाहते हैं जिसके चलते हैं माता-पिता से संघर्ष एवं विरोध का भी सामना करना पड़ता है.

▶(4). किशोरावस्था में मानसिक विकास (Mental development in Adolescence)

पियाजे (Piaget) के अनुसार, किशोरावस्था से बालकों का संज्ञानात्मक विकास एक नया रुख अपनाता है पियाजे ने यह बताया कि किशोरावस्था से ही संज्ञानात्मक विकास की विशेष अवस्था प्रारंभ होती है जिसे औपचारिक परिचालन की अवस्था कहा जाता है. बालक इस अवस्था में किसी समस्या का समाधान करने में उस समस्या के सभी पहलुओं की परख करता है. सभी संभावित समाधानों को मन में एकत्रित करता है तथा किसी वस्तु के सभी तरह के गुणों के बीच संबंध की जांच भी करता है. किसी समस्या के समाधान में बालक क्रमबद्ध निगमनात्मक चिंतन करता है जो स्पष्टतः एक प्रकार का वैज्ञानिक चिंतन है, क्योंकि इसमें समस्या के सभी संभावित समाधान होते हैं और बालक तार्किक रूप से सभी अनुपयुक्त साधनों को छाँटते हुए एक अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष पर पहुंचता है.

किशोरावस्था में होने वाले प्रमुख विकासों के अधिक अध्ययन के लिए click करें.

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